दलित युवक के साथ हुई मारपीट के मामले में जब अकाली नेता का नाम सामने आया तो थाना कैंट पुलिस ने पीड़ित की शिकायत पर अज्ञात लोगों पर एफआईआर तो दर्ज कर ली, लेकिन एससी-एसटी एक्ट को नहीं लगाया।
15 मार्च की शाम को स्थानीय अजीत रोड में अर्श हर्बल स्टोर में सात से ज्यादा व्यक्ति दाखिल हुए। वे दुकान में बैठे दलित भाईचारे से संबंधित युवक गुरदास सिंह से दुकान मालिक के बारे में पूछने लगे। युवक की ओर से जब मालिक के बाहर जाने के बारे में बताया गया तो उन्होंने उक्त युवक से ही मारपीट कर उसे घायल कर दिया। इसके बाद वे मौके से फरार हो गए। वहीं उक्त घटना दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई।
सिविल अस्पताल में इलाज करवा रहे दलित युवक गुरदास सिंह के बयान लिखने ले लिए जब थाना कैंट के एक एएसआई गए। इस दौरान वहां पर गुरदास सिंह ने बताया कि वह हमलावरों के नाम तो नहीं जानता, लेकिन वह सामने आने पर उन्हें पहचान लेगा। उक्त हमलावर किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने दुकान मालिक जीता सिंह को सबक सिखाने के लिए भेजे गए थे।
पीड़ित युवक के जब अकाली नेता का नाम लिया तो बयान लिखने गए थानेदार ने जांच का काम एफआईआर में ही निपटाते हुए यह लिख दिया गया कि संबंधित अकाली नेता और दुकान मालिक जीता सिंह की पुरानी अनबन है, इसलिए यह मामला संदेहजनक है। इसमें जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर आगामी कार्रवाई की जाएगी।
कानून के अनुसार अगर कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को उसकी इमारत में घुसकर उसके साथ मारपीट करता है, तो उस पर धारा 452 लगती है। वहीं इस मामले में पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धारा 451, 323, 148 और 149 लगा दी। जब पीड़ित युवक गुरदास सिंह ने पुलिस अधिकारी को यह बताया कि वह एससी जाति से संबंधित है, इसके बावजूद पुलिस अधिकारी ने उक्त मामले में कहीं पर भी एससी एसटी एक्ट का जिक्र नहीं किया।
इस बारे में अनुसूचित जाति कमीशन के उप चेयरमैन राजकुमार वेरका का कहना था कि अगर कोई भी व्यक्ति यह जानतेे हुए भी दलित व्यक्ति के साथ ज्यादती करे कि वह दलित है, तो पुलिस को यह एक्ट लगाना चाहिए। वकील गुरबिंदर सिंह मान का कहना था कि उक्त पुलिस अधिकारी ने इस मामले में यह एक्ट न लगाकर धारा 218 की अवहेलना की है। इसके चलते पीड़ित व्यक्ति उक्त पुलिस अधिकारी के खिलाफ अदालत में भी जा सकता है।