सूबे में किडनी खरीद फरोख्त का कारोबार एक इंडस्ट्री का रूप धारण कर चुका है। 2002 में अमृतसर में किडनी कांड का खुलासा हुआ था।
करीब 150 करोड़ के कारोबार से पर्दा उठा था, फिर भी सरकार की तरफ से ठोस कदम नहीं उठाए गए। साथ ही बनाए गए नियमों में भी छेद कर कारोबार पंजाब में फलता फूलता रहा।
हालात यह है कि सूबे में 19 अस्पताल बिना किसी सरकारी नोटिफिकेशन के किडनी की ट्रांसप्लांट का कारोबार करते रहे। अब जब नींद खुली तो डायरेक्टर ऑफ रिसर्च एंड मेडिकल एजुकेशन की ओर से इन अस्पतालों को नोटिस जारी किया है, जो बिना सरकार की नोटिफिकेशन के रिलेशनशिप में किडनी ट्रांसप्लांट का काम करते रहे।
इसी बिना नोटिफाई नियम की आड़ में जालंधर के नेशनल किडनी अस्पताल में खुलकर किडनी खरीदो फरोख्त का कारोबार हुआ और 10 से 15 लाख रुपये के बीच गुर्दा खरीदा गया।
पंजाब में किडनी के कारोबार का खुलासा 2002 में हुआ तो नियम को एक बार फिर से खंगाला गया और कई बदलाव भी किए गए। तत्कालीन स्कैंडल में अकेले सरीन अस्पताल में 1922 किडनी ट्रांसप्लांट की गई थी।
इसके साथ ही ब्लड रिलेशन में किडनी ट्रांसप्लांट करने के लिए अस्पताल को सरकार से मंजूर करवाना होता है और नोटिफाई करवाया जाता है।
हालात ये है कि अभी तक सिर्फ मोहाली के फोर्टिस अस्पताल और डीएमसी लुधियाना ने ही खुद को सरकार से नोटिफाई करवा रखा है।
इसी बीच 2011 में मोहाली में सिल्वर ओक व सूर्या किडनी अस्पताल का खुलासा हुआ था, जहां पर किडनी खरीद फरोख्त के कारोबार से पर्दा हटा था।
इसके चार साल बाद भी पंजाब सरकार व डीआरएमई ने अपनी जांच में अस्पतालों पर स्कैन नहीं किया और नतीजन यह कारोबार पंजाब में बढ़ता ही चला गया।
नेशनल किडनी अस्पताल के नाम का खुलासा होने से अब डीआरएमई ने 19 अस्पतालों को नोटिस भेज दिया है, जिनमें प्रदेश के नामी गिरामी अस्पताल भी शामिल हैं।
डीआरएमई ने नोटिस जारी कर अस्पतालों से स्पष्टीकरण मांगा है, अगर डायरेक्टर को खामियां पाई जाती हैं तो इन बड़े अस्पतालों को सील भी किया जा सकता है, वहां पर किडनी के ट्रांसप्लांट पर पूर्ण रूप से रोक लगाई जा सकती है।