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पानी से लेकर चंडीगढ़ तक हक की लड़ाई तेज: चुनाव से पहले आप ने उठाए मुद्दे, एसवाईएल नहीं अब वाईएसएल की जंग

Fri, 06 Nov 2026 10:20 AM IST
Nivedita मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

पंजाब की आप सरकार यमुना के पानी में पंजाब की दो-तिहाई हिस्सेदारी, राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की रॉयल्टी और चंडीगढ़ व पंजाब यूनिवर्सिटी पर राज्य के अधिकारों की पैरवी कर विरोधियों को घेरने की तैयारी में है।
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पंजाब चुनाव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले पानी और राजधानी के मुद्दों पर सियासत गरमाने लगी है। आम आदमी पार्टी सरकार ने नशे, बेरोजगारी और बिगड़ती कानून-व्यवस्था के अलावा इन मुद्दों को भी सियासी मंचों पर उठाना शुरू कर दिया है। 
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सरकार यमुना के पानी में पंजाब की दो-तिहाई हिस्सेदारी, राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की रॉयल्टी और चंडीगढ़ व पंजाब यूनिवर्सिटी पर राज्य के अधिकारों की पैरवी कर विरोधियों को घेरने की तैयारी में है।

दरअसल, पंजाब के हर चुनाव में एसवाईएल (सतलुज-यमुना लिंक नहर) बड़ा सियासी मुद्दा बनता रहा है, लेकिन इस बार इस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हो रही है। आप सरकार ने इसके बजाय वाईएसएल (यमुना-सतलुज लिंक नहर) का मुद्दा उठाकर पंजाब के पानी के हक की बात शुरू कर दी है। एसवाईएल के जरिये हरियाणा सतलुज के पानी पर अपना दावा जताता रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने अब यमुना के पानी में भी पंजाब की हिस्सेदारी का सवाल उठाया है।
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मान का कहना है कि यदि हरियाणा सतलुज के पानी में अपना हिस्सा मांगता है तो पंजाब का भी यमुना के पानी पर हक है, क्योंकि यमुना संयुक्त पंजाब का हिस्सा रही है। चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ने हाल ही में हुए विधानसभा के विशेष सत्र में इस संबंध में प्रस्ताव भी पारित करवाया है। वह स्पष्ट कर चुके हैं कि हरियाणा को देने के लिए पंजाब के पास अतिरिक्त पानी नहीं है। इसके बजाय हरियाणा को यमुना के पानी में पंजाब का बनता हिस्सा देना चाहिए। मान का कहना है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री आए दिन पंजाब का दौरा करते हैं, लेकिन इस मुद्दे पर कोई जवाब नहीं देते।

1966 के बंटवारे को बनाया आधार
पंजाब का यमुना के पानी में हिस्सा मांगने का आधार 1966 में राज्य के पुनर्गठन से जुड़ा है। राज्य सरकार का तर्क है कि यमुना अविभाजित पंजाब की नदी प्रणाली का हिस्सा थी, लेकिन पुनर्गठन के बाद पानी के बंटवारे में पंजाब को शामिल नहीं किया गया। सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले 12 मार्च 1954 को अविभाजित पंजाब और उत्तर प्रदेश के बीच हुए समझौते का हवाला देते हुए यमुना के पानी में दो-तिहाई हिस्सेदारी का दावा किया है। जल संसाधन मंत्री बरिंदर सिंह गोयल का कहना है कि वर्ष 1994 के जल बंटवारा समझौते में पंजाब शामिल नहीं था। पंजाब सरकार ने अप्रैल 2025 में इस मामले में ट्रिब्यूनल गठित करने की मांग भी की थी।

राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ की रॉयल्टी का दावा
पंजाब सरकार ने राजस्थान को दशकों से दिए जा रहे पानी के बदले रॉयल्टी का मुद्दा भी उठा दिया है। सरकार का दावा है कि राजस्थान 1960 से पंजाब की नदियों का पानी इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन इसके बदले कोई भुगतान नहीं कर रहा। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने 1920 के ब्रिटिशकालीन समझौते का हवाला देते हुए राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की रॉयल्टी मांगी है। सरकार के मुताबिक, राजस्थान को करीब 18 हजार क्यूसेक पानी दिया जा रहा है।

पंजाब विधानसभा ने 28 अक्तूबर को बकाया रॉयल्टी की वसूली के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी थी। जल संसाधन मंत्री बरिंदर सिंह गोयल का कहना है कि रॉयल्टी नहीं मिलने की स्थिति पूर्व सरकारों की गलतियों के कारण बनी। वहीं, राजस्थान सरकार ने पंजाब के इस दावे को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया है। चुनाव से पहले आप सरकार इस मुद्दे को पंजाब के जल अधिकारों और आर्थिक हितों से जोड़कर उठा रही है।

चंडीगढ़ और पीयू पर भी तेज हुई पैरवी
चुनाव से पहले पंजाब-हरियाणा की साझा राजधानी चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने और पंजाब यूनिवर्सिटी पर राज्य के अधिकारों का मुद्दा भी गरमाने लगा है। मुख्यमंत्री भगवंत मान लगातार चंडीगढ़, पीयू और पंजाब के अधिकारों की पैरवी कर रहे हैं। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार पंजाब के अधिकारों में दखल दे रही है। पीयू के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव के विरोध में शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस और वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा भी मोर्चा खोल चुके हैं। इस तरह आप सरकार पानी के बंटवारे से लेकर राजधानी और विश्वविद्यालय के अधिकारों तक के मुद्दों को चुनाव से पहले सियासी बहस के केंद्र में लाने में जुटी है।
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