बठिंडा जिले के गांव जय सिंह वाला में नशे ने पूर्व सरपंच व उसके बेटों को इस कदर खत्म कर दिया कि उन्हें अपनी जमीन बेचनी पड़ी और अब मौजूदा समय में अलग-अलग डेरों में जाकर दिन काटते एवं रोटी खाते हैं।
बेटे को जिंदा रखने के लिए मां करती है नशे की पूर्ति
गांव की एक महिला सीबो कौर ने बातचीत के दौरान बताया कि उनके दो बेटे थे, एक की सड़क हादसे में मौत हो गई। 24 साल का दूसरा बेटा चिट्टे एवं अन्य मेडिकल नशे की चपेट में आ गया। महिला ने बताया कि अब हालात यह है कि मैं अपने बेटे की नशे की पूर्ति के लिए लोगों के घरों में काम करने को मजबूर हूं।
महिला ने बताया कि अगर वह अगर एक दिन अपने बेटे के लिए नशे की पूर्ति नहीं कर पाती तो रातभर उसे डर लगा रहता है कि कहीं उसके बेटे की नशा न मिलने के कारण मौत न हो जाए। इसलिए अब वो अपने बेटे को जिंदा रखने के लिए खुद नशे की पूर्ति के लिए पैसे जुटाती है।
गांव की एक अन्य महिला बलजीत कौर ने कहा उनका बेटा 20 साल का है। वह बीते करीब चार वर्षों से नशे की दलदल में ऐसा घुसा कि अब उसका बाहर निकलना मुश्किल लग रहा है। महिला ने बताया कि दिन में उसका बेटा तीन इंजेक्शन लगाता है। अगर उसे नशा नहीं करने देते तो वह तड़पता है। महिला ने बताया एक मां से अपने बेटे का तड़पना नहीं देखा जाता। महिला ने बताया कि कुछ माह पहले ही उसकी शादी हुई है। अब उसे डर सता रहा है कि कहीं नशा उसके जवान बेटे को निगल न जाए।
कारपेंटर को भी नशे ने दी मौत
करीब तीन-चार दिन पहले गांव जय सिंह वाला की एक जगह से गुरादित्ता रिंमपल नामक युवक का शव मिला था, जिसकी बाजू पर इंजेक्शन लटक रहा था। मृतक युवक के चाचा सुखपाल सिंह ने बताया कि मेरा भतीजा बहुत अच्छा कारपेंटर था, लेकिन बुरी संगत में पड़ने के बाद वह नशे की दलदल में फंस गया। उन्होंने बताया कि गांव में चिट्टा और गोलियों को पीस कर पाउडर बनाकर तस्करों द्वारा शरेआम बेचा जा रहा है, लेकिन जब भी पुलिस आती है तो तस्कर गायब हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि अगर पुलिस प्रशासन नशा करने वालों को मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें नशा मुक्ति केंद्रों में दाखिल करवाए तो बहुत युवक बच सकते हैं, लेकिन पुलिस प्रशासन नशा करने वालों पर ही केस दर्ज कर देती है और तस्कर बेखौफ होकर नशा बेचते हैं।