मानसून के दौरान पहाड़ों का पानी अब पंजाब में काफी नुकसान पहुंचा रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते पिछले कुछ साल से मानसून का दौर लंबा चल रहा है। इसी वजह से उत्तर भारत के मैदानी व पहाड़ी इलाकों में बारिश अपेक्षाकृत अधिक हो रही है।
बड़े बांधों पर बढ़ रहा दबाव कम कैसे किया जाए इस पर सरकार जल स्रोत महकमे के अफसरों और विशेषज्ञों के साथ मंथन करेगी क्योंकि इस बाढ़ से सरकार और लोगों को बहुत ज्यादा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री भगवंत मान इसके लिए खासे गंभीर हैं। बाढ़ ग्रस्त इलाकों का दौरा कर सीएम ने विभिन्न जिलों के लोगों से भी बाढ़ से बचाव संबंधी सुझाव जाने। अब विशेषज्ञों और अफसरों के साथ मंथन कर पहाड़ों से आने वाले बारिश के पानी का प्रबंधन कर इसके डिस्ट्रीब्यूटरी चैनल सिस्टम पर व्यापक योजना तैयार की जाएगी।
जल स्रोत महकमे के अफसर बताते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा का जो पानी भूजल में भी समाहित होता है, वह भी बाद में नदियों और जलाशयों के माध्यम से पंजाब तक पहुंचता है। इसी तरह पहाड़ी इलाकों में बनाए गए जलाशयों और बांधों से भी पानी संग्रहित होकर समय-समय पंजाब में ही आता है। पंजाब में छोटे-बड़े कुल 15 बांध हैं। यह पानी पंजाब भाखड़ा नंगल डैम, रणजीत सागर डैम समेत अन्य छोटे बांधों पर दबाव को बढ़ा देता है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पंजाब में बाढ़ की घटनाएं अकसर मौसम के कारण होती हैं, विशेष रूप से मानसून के दौरान। उधर बाढ़ की मार झेल रहे लोगों का कहना है कि साल 1988 के बाद पहली बार सूबे में इतनी भीषण बाढ़ आई है।
साल 1988 में पंजाब ने बड़ी बाढ़ झेली थी। इसमें कई लोग व पशुओं की जान चली गई थी। कई जिलों में भारी जलभराव की स्थिति थी और सूबे में खासा नुकसान हुआ था।