पंजाब के किसानों का दालों की खेती से मोहभंग होता जा रहा है जिस कारण हर साल दालों की पैदावार कम होती जा रही है। कटाई के समय और बाद में दालों का अधिक नुकसान होता है। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) न मिलने के कारण किसान दालों की खेती छोड़ते जा रहे हैं।
कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने इस संबंध में संसद में एक रिपोर्ट पेश की है। इसके अनुसार वर्ष 2025-26 के दौरान प्रदेश में 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में दालों की खेती हुई है जिससे 32 हजार टन पैदावार हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर दालों की पैदावार में पहले से वृद्धि हुई है लेकिन सूबे में यह कम होती जा रही है।
वर्ष 2024-25 में भी मात्र 37 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खेती हुई जबकि सिर्फ 34 हजार टन दालों की पैदावार हुई। सूबे के किसानों का चावल और गेहूं उगाने पर अधिक जोर है। दोनों फसलों पर किसानों को एमएसपी की गारंटी मिलती है। यही कारण है कि जो किसान पहले दालों की खेती करते थे वो भी अब चावल और गेहूं की फसलों का ही रुख कर रहे हैं।
केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2025 में दालों की खेती बढ़ाने के लिए एक मिशन शुरू किया है। 11,440 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटन वाले इस मिशन का लक्ष्य 2025-26 से 2030-31 तक छह साल की अवधि में दालों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाना और दालों की खेती में आत्मनिर्भर बनना है। पंजाब में राज्य में 3 से 4 लाख टन से ज्यादा दालों की खपत है जिसके लिए दूसरे देशों से इनका आयात किया जाता है।