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पंजाब में धर्म के इर्द-गिर्द घूमने लगी सियासत: पंथक वोट बैंक बिखरने की आशंका, आकलन में जुटे राजनीतिक दल

Tue, 30 Jun 2026 01:40 PM IST
Nivedita मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

फरवरी 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। चुनाव समय से पहले होने की भी अटकलें चल रही हैं। इसी को देखते हुए सभी सियासी दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं।
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पंजाब विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब की सियासत धर्म और पंथ के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। पिछले कुछ दिनों के भीतर ऐसे कुछ सियासी घटनाक्रम सामने आए हैं जिनका असर निश्चित ताैर पर भावी चुनाव पर पड़ेगा। इसी के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां भावी समीकरणों से नफा और नुकसान के आकलन में जुट गई हैं।

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दलों को जहां पंथक वोट बैंक बिखरने की आशंका सता रही हैं वहीं सिख-हिंदू एकता पर भी दलों की नजर गड़ी है।

अभी तक दलों का जो रुख और उनकी प्राथमिक रणनीति है, उस लिहाज से यह बात तो तय है कि पंजाब में सिख और हिंदू के बिखराव की बात कोई नहीं करेगा क्योंकि जीत के लिए यहां दोनों समुदाय के लोगों का वोट बेहद जरूरी है। यहां हिंदू और मुसलमान का शोर भी नहीं सुनाई देगा मगर फिर भी सियासत धूरी धार्मिक समीकरणों के आसपास ही घूमेगी।

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शिअद हाशिये पर

शिरोमणि अकाली दल (शिअद) सूबे की सबसे पुराने पंथक पार्टी मानी जाती है मगर साल 2022 के बाद से थोड़ा हाशिये पर चल रही है। पहला झटका तब लगा जब शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) का गठन हुआ और दूसरी चोट शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) ने पहुंचाई। इस दौरान शिअद बिखरा और कुछ दिन पहले ही दाखा से शिअद के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली भी शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के खेमे में चले गए। अयाली बड़े पंथक नेता माने जाते हैं, जो जाहिर तौर पर शिअद को नुकसान पहुंचाकर वारिस पंजाब दे को मजबूत करेंगे। इस घटनाक्रम के बाद पंथक वोट बैंक का बिखराव निश्चित माना जा रहा है।

आप भी पंथक विवाद में उलझी

दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी पिछले दिनों से कुछ बड़े पंथक मसलों से संबंधित विवादों में उलझी हुई है। पहला विवाद बिना एसजीपीसी और श्री अकाल तख्त की रायशुमारी के सूबे में नया बेअदबी रोधी संशोधन कानून लागू कराना और दूसरा विवाद सीएम भगवंत सिंह मान की कथित विवादित वायरल वीडियो से जुड़ा है।

दोनों मामलों में श्री अकाल तख्त साहिब ने संज्ञान लेकर सीएम के खिलाफ हुक्मनामा जारी किया है। आप हाईकमान को लगता है कि इससे पंथक वोट बैंक का नुकसान हो सकता है, लिहाजा पार्टी ने अब हिंदू वोट बैंक पर भी पूरी नजरें गढ़ा ली हैं। पिछले दिनों हिंदू समुदाय के लोगों से जुड़ी पांच बड़ी घोषणाएं इसी का नतीजा हैं।

भाजपा का सरकार-ए-खालसा माॅडल

भाजपा-कांग्रेस को भी मालूम है कि जीत के लिए हिंदू-सिख वोट बैंक बेहद जरूरी है। भाजपा यह भी जानती है कि सूबे में पंथक वोट बैंक हमेशा उनसे दूर ही रहा है मगर इस बार पार्टी की रणनीति थोड़ी अलग है। भाजपा कुछ पंथक नेताओं को पार्टी से जाेड़ रही है और अध्यक्ष पद का चेहरा भी इस बार सिख ही दिया है। इतना हीं नहीं पार्टी महाराजा रणजीत सिंह के सरकार-ए-खालसा समावेशी शासन मॉडल को उजागर करते हुए यह साबित करने की कोशिश की है कि राज्य में सामाजिक सद्भाव और व्यापक प्रतिनिधित्व के प्रति भाजपा पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

कांग्रेस का फोकस जट सिख, एससी वोट बैंक पर ज्यादा

कांग्रेस के पास सिख नेताओं की कमी तो नहीं है मगर फिलहाल पंथक और हिंदू वोट बैंक पर पकड़ और बनानी पड़ेगी। कांग्रेस का फोकस जट सिख और एससी वोट बैंक पर ज्यादा हो सकता है।
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