हिमालय से निकलने वाली नदियां शहरों और गांवों की प्यास बुझाने, खेतों की सिंचाई और जलीय जीवन को सहारा देने में अहम हैं। लेकिन नदी की सेहत का खतरा सिर्फ बहते पानी में नहीं, उसकी तलहटी में जमा तलछट में भी छिपा हो सकता है।
पंजाब यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ एनवायर्नमेंटल स्टडीज से जुड़े शोधकर्ताओं मधुरी एस ऋषि, राखी सिंह, लखविंदर कौर और नीलम सिद्धू के अध्ययन में हिमालयी नदियों की तलछट में धातु प्रदूषण की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। एनवायर्नमेंटल मॉनिटरिंग एंड असेसमेंट में सितंबर 2026 में प्रकाशित अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की चंद्रा नदी, ब्यास नदी और चक्की खड्ड की सतही तलछट की जांच की गई।
शोधकर्ताओं ने तीनों नदी प्रणालियों से 10-10 यानी कुल 30 नमूने लिए। इनमें क्रोमियम, निकेल, कोबाल्ट, कॉपर, जिंक और लेड जैसे छह ट्रेस मेटल की मात्रा जांची गई और अलग-अलग प्रदूषण सूचकांकों से पारिस्थितिक जोखिम का आकलन किया गया। अध्ययन में चक्की खड्ड तीनों में सबसे अधिक प्रभावित मिली। नेमेरो पॉल्यूशन इंडेक्स के अनुसार यहां 70 फीसदी नमूने चेतावनी स्तर के प्रदूषण में पाए गए। निकेल को लेकर भी स्थिति गंभीर रही।
चक्की खड्ड में निकेल का बढ़ा खतरा, मानवीय गतिविधियां बनीं बड़ी चिंता
चक्की खड्ड के 70 फीसदी नमूनों में निकेल की मात्रा प्रॉबेबल इफेक्ट कॉन्सन्ट्रेशन (पीईसी) से ऊपर मिली। क्रोमियम की पीईसी सीमा भी तीनों नदी क्षेत्रों के कई नमूनों में पार हुई। इसके विपरीत चंद्रा नदी अपेक्षाकृत कम प्रभावित मिली। शोध में चंद्रा में धातुओं की मौजूदगी को मुख्य रूप से प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक स्रोतों से जोड़ा गया है। ब्यास में प्राकृतिक और मानवजनित दोनों प्रभाव मिले, जबकि चक्की खड्ड में मानवीय गतिविधियों का असर अधिक स्पष्ट रहा।
रेत खनन और डाइंग उद्योग पर सवाल
शोधकर्ताओं ने रेत खनन और डाइंग उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट को धातु प्रदूषण के संभावित प्रमुख स्रोतों में शामिल किया है। तलछट में जमा धातुएं परिस्थितियां बदलने पर दोबारा पानी या जलीय जीवों के संपर्क में आ सकती हैं। ऐसे में नदी से रेत-बजरी निकालने का असर केवल उसके स्वरूप तक सीमित नहीं माना जा सकता।
सिर्फ पानी की जांच से पूरी तस्वीर नहीं
शोध यह निष्कर्ष नहीं देता कि इन नदियों का पानी पीने योग्य नहीं है। अध्ययन का केंद्र सतही तलछट और उससे जुड़े पारिस्थितिक जोखिम हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि नदी की वास्तविक सेहत समझने के लिए पानी के साथ तलछट की नियमित निगरानी भी जरूरी है। अध्ययन को हिमालयी नदी घाटियों के लिए महत्वपूर्ण ट्रेस-मेटल बेसलाइन डेटा बताया गया है। भविष्य की जांच से प्रदूषण के स्तर में बदलाव का पता लगाया जा सकेगा।
तीन नदियां... तीन तस्वीरें
चंद्रा नदी: अपेक्षाकृत कम प्रभावित मिली। यहां धातुओं की मौजूदगी में प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक स्रोतों का प्रभाव अधिक रहा।
ब्यास नदी: धातु प्रदूषण पर प्राकृतिक और मानवजनित, दोनों स्रोतों का असर मिला।
चक्की खड्ड: तीनों में सबसे अधिक प्रभावित। यहां मानवीय गतिविधियों का प्रभाव प्रमुख चिंता के रूप में सामने आया।
छह धातुएं, छह संकेत
क्रोमियम: अधिक मात्रा जलीय पारिस्थितिकी के लिए चिंता बढ़ा सकती है।
निकेल: चक्की खड्ड के 70 प्रतिशत नमूने पीईसी यानी संभावित प्रभाव सीमा से ऊपर मिले।
कोबाल्ट: बढ़ी हुई मात्रा पारिस्थितिक जोखिम बढ़ा सकती है।
कॉपर: अधिक सांद्रता जलीय जीवों के लिए नुकसानदेह हो सकती है।
जिंक: जीवों के लिए आवश्यक तत्व है, लेकिन अधिक मात्रा नुकसान पहुंचा सकती है।
लेड: विषैला भारी धातु है। चंद्रा नदी में जियो-एक्यूमुलेशन इंडेक्स का अधिकतम मान 1.71 दर्ज किया गया।