रेलवे की जांच में कमी
कोर्ट ने कहा कि रेलवे को यह साबित करना था कि मृतक बिना टिकट यात्रा कर रहा था। इसके लिए उसे स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर जांच करनी चाहिए थी। रेलवे यह पता कर सकता था कि टिकट परीक्षक ने मृतक का टिकट देखा था या नहीं। ट्रेन के गार्ड, अन्य कर्मचारियों अथवा सहयात्रियों से भी जानकारी ली जा सकती थी।
मुआवजे का आदेश
हाईकोर्ट ने माना कि रेलवे ने जांच के गंभीर प्रयास नहीं किए। किसी टिकट परीक्षक या रेलवे अधिकारी को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। अदालत ने मृतक को वैध यात्री माना और उसकी मौत को रेलवे अधिनियम के तहत अप्रिय घटना की श्रेणी में रखा इसलिए मृतक के माता-पिता मुआवजे के हकदार हैं। अदालत ने उन्हें आठ लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है जिस पर दावा दायर करने की तारीख से भुगतान तक नौ प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।