दूध में मिले कई तरह के प्लास्टिक के कण
अध्ययन में दूध के नमूनों में अलग-अलग आकार, रंग और प्रकार के कण पाए गए। वैज्ञानिकों ने पीईटी, पॉलीइथिलीन (पीई), पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीयूरेथेन (पीयू), पॉलीकार्बोनेट (पीसी), पीईवीए और पीएलए जैसे प्लास्टिक पॉलिमर की पहचान की। इसके अलावा रेयॉन और कॉटन के रेशे भी मिले।
विशेषज्ञों के अनुसार, इससे पता चलता है कि दूध में मौजूद सूक्ष्म कणों की प्रकृति अलग-अलग हो सकती है। माइक्रोप्लास्टिक पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कणों को कहा जाता है। इनमें से कई इतने छोटे होते हैं कि उन्हें सामान्य आंखों से देखना संभव नहीं होता। प्लास्टिक की वस्तुओं, पैकेजिंग और अन्य स्रोतों से ऐसे कण पर्यावरण में पहुंच सकते हैं। दूध में इनकी मौजूदगी का पता लगना खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
कई तकनीकों से की कणों की पहचान
शोधकर्ताओं ने नमूनों में संभावित कणों की पहचान के लिए ऑप्टिकल माइक्रोस्कोप के साथ कई वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। एफटीआईआर और रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी से कणों की पहचान की गई। एसएफईसी नाम की विशेष गणना पद्धति के जरिये कणों के स्पेक्ट्रम का उपलब्ध डाटाबेस से मिलान किया गया। वहीं, एफईएसईएम-ईडीएक्स तकनीक से कणों की बनावट और उनमें मौजूद तत्वों से जुड़ी विशेषताओं का विश्लेषण किया गया। इन तकनीकों को साथ इस्तेमाल करने का उद्देश्य सूक्ष्म कणों की पहचान को अधिक भरोसेमंद बनाना था।
दूध में कण कहां से पहुंचे, इसकी जांच जरूरी
दूध बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों के भोजन का हिस्सा है। ऐसे में इसमें माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी सामने आना खाद्य गुणवत्ता की निगरानी के लिहाज से अहम है। हालांकि, अध्ययन से यह तय नहीं होता कि चंडीगढ़ में दूध के नमूनों तक ये कण किस चरण में पहुंचे। इनके संभावित स्रोतों का पता लगाने के लिए दूध के उत्पादन, संग्रह, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और परिवहन की अलग-अलग जांच करनी होगी। अध्ययन में कणों की मौजूदगी दर्ज की गई है, लेकिन इससे अकेले स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों या किसी खास स्रोत की पुष्टि नहीं होती।
यह बेहद महत्वपूर्ण अध्ययन है क्योंकि आम लोगों को यह जानकारी ही नहीं है कि दूध जैसी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीज में भी माइक्रोप्लास्टिक मौजूद हो सकता है। लोगों के लिए यह जानना जरूरी है कि वे जिन खाद्य पदार्थों को सुरक्षित मानकर इस्तेमाल करते हैं उनमें भी माइक्रोप्लास्टिक के कण हो सकते हैं। यह अध्ययन इस अनदेखे पहलू के प्रति लोगों को जागरूक करने की दिशा में अहम है। - प्रो. अनुपमा ठाकुर, चेयरपर्सन, डॉ. एसएस भटनागर यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी और एनर्जी रिसर्च सेंटर