पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने समय पूर्व रिहाई के आवेदन लंबित रहने वाले 412 कैदियों को दो सप्ताह के भीतर अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कैदियों के आवेदनों पर कार्रवाई करने में विफलता के लिए राज्य अधिकारियों को भी फटकार लगाई है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में कैदियों के आवेदनों पर कार्रवाई करने में राज्य एजेंसियों की ओर से विफलता चिंताजनक है। ऐसा करने से आवेदक कैदियों को और अधिक कारावास का सामना करना पड़ा है, जबकि वे रिहा होने के योग्य हो सकते हैं। इस तरह का अनुशासनहीन दृष्टिकोण दोषियों के अधिकारों और कल्याण के विषय पर विकसित हुई उदासीनता का लक्षण है।
हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ को पिछले दो साल से लंबित समयपूर्व रिहाई के मामलों के विवरण के साथ हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि कैदियों के साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिक जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता। एक बार लागू नीति के अनुसार समयपूर्व रिहाई के लिए विचार किए जाने के योग्य होने के बाद, राज्य उन्हें उचित कारण दर्ज किए बिना इस रियायत से इन्कार नहीं कर सकता। राज्य का कर्तव्य है कि वह निष्पक्ष रूप से कार्य करे और अपने द्वारा तैयार की गई नीति के अनुसार इस तरह आगे बढ़े कि समझदारीपूर्ण अंतर के अभाव में समान स्थिति वाले व्यक्तियों के बीच भेदभाव न हो।
कोर्ट ने कहा कि कैदियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे राज्य की मर्जी के अनुसार जिएं और न ही उनकी कैद प्रशासन को उनके मौलिक अधिकारों को खतरे में डालने का अधिकार देती है। स्वतंत्रता और गरिमा की सांविधानिक गारंटी पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकार, जिसमें स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार शामिल है, संविधान की ओर से दिए गए हैं, न कि राज्य द्वारा।
बेंच ने कहा कि चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ आवेदन लगभग दो वर्षों से लंबित हैं। ऐसे में, इस न्यायालय के पास संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों को इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर ऐसे कैदियों को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का निर्देश देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है।