सरकार के इस कदम को नेताओं ने कर्मचारियों को बांटने और आंदोलन को कमजोर करने की साजिश बताई है। पीएसएस ऑफिसर्स एसोसिएशन के प्रदेश प्रधान मंजीत सिंह रंधावा ने कहा, यह संघर्ष करीब सवा तीन लाख कर्मचारियों और चार लाख पेंशनरों का है। कर्मचारी पूरी तरह से एकजुट हैं। उन्होंने कहा, सरकार द्वारा जिन 85 हजार कर्मचारियों को 60 प्रतिशत डीए दिए जाने की योजना तैयार की जा रही है, उनमें से बहुत से कर्मचारी तो ऐसे हैं, जिनकी सर्विस को अभी तीन साल का समय पूरा नहीं हुआ है।
उनके अनुसार सेवा शर्ताें के तहत ऐसे कर्मचारियों को तीन साल तक भत्तों का लाभ नहीं मिलेगा। केवल बेसिक सैलरी ही दी जानी है। ऐसे में उन्हें यह लाभ मिल ही नहीं सकता। यह सिर्फ कर्मचारियों को बांटने की साजिश है। कर्मचारी नेता कुलवंत सिंह ने कहा कि सामान्य राज्य प्रशासनिक विभाग कर्मचारी नेताओं के तबादले कर रहा है। यह उचित नहीं है क्योंकि लोकतंत्र में अपना हक मांगना और उसके लिए संघर्ष करना गलत नहीं है।
उद्योग मंत्री ने हड़ताल को बताया अवैध
वहीं, पंजाब के उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री अमन अरोड़ा ने सोमवार को प्रस्तावित कर्मचारी हड़ताल को अवैध बताते हुए कहा कि डीए का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। उन्होंने कर्मचारी संगठनों से अपील की कि वे राजनीतिक हितों का साधन न बनें और सरकार के साथ बातचीत के जरिये अपनी मांगों का समाधान करें।
अमन अरोड़ा ने कहा कि भगवंत मान सरकार कर्मचारियों के हितों के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी प्रदेश के करीब तीन करोड़ लोगों के प्रति भी है। यदि हड़ताल के कारण जरूरी सार्वजनिक सेवाएं बाधित होती हैं और लोगों को परेशानी होती है तो सरकार कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि 17 जुलाई 2020 के बाद भर्ती हुए करीब 85 हजार कर्मचारियों की डीए संबंधी मांग सरकार पहले ही पूरी कर चुकी है। इन कर्मचारियों का डीए 42 से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का फैसला लिया गया है।
शेष कर्मचारियों के मामले में भी सरकार तुलनीय केंद्रीय कर्मचारियों के समान वास्तविक वेतन सुनिश्चित करने के लिए तैयार है, बशर्ते यह कानूनी और वित्तीय दायरे में हो।
मंत्री ने कहा कि डीए और बकाया राशि का व्यापक मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सरकार ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रख दिया है और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का पालन किया जाएगा।
अरोड़ा ने पंजाब की वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि राज्य अपने राजस्व प्राप्तियों का करीब 51 प्रतिशत वेतन और पेंशन पर खर्च करता है जबकि अखिल भारतीय औसत करीब 38 प्रतिशत है। प्रमुख राज्यों में यह अनुपात सबसे अधिक है। वहीं ब्याज समेत प्रतिबद्ध देनदारियां राजस्व प्राप्तियों की करीब 82 प्रतिशत हैं। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों और पेंशनरों के स्वीकृत बकाये को चुकाने के लिए सरकार ने संरचित व्यवस्था बनाई है।