केंद्र सरकार जन औषधि और अमृत फार्मेसी से आम लोगों को सस्ती दवाइयां मुहैया कराने में जुटी है जबकि चंडीगढ़ पीजीआई इन कोशिशों को नाकाम करने में जुटा है।
सूत्रों की मानें तो इस खेल के पीछे कमीशन का बड़ा हाथ है। दवा कंपनियां टेंडर हासिल करने के लिए भारी-भरकम कमीशन देती हैं। पीजीआई की ओर से महंगी ब्रांडेड दवाइयों की अंधाधुंध खरीद इस बात की पुष्टि करती है कि नियमों को ताक पर रखकर मोटी रकम बनाई जा रही है। इसका सीधा खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है जिन्हें महंगी दवाइयां खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है।
सरकार इसी कारण जन औषधि केंद्रों और अमृत फार्मेसी को बढ़ावा दे रही है। यहां तक कि इन दुकानों से कोई किराया भी नहीं लिया जाता। पीजीआई जैसी जगह पर जहां इन दुकानों से करोड़ों रुपये का किराया मिल सकता था वहां भी सरकार ने ये दुकानें मुफ्त में चलाने की अनुमति दी। इसके बावजूद संस्थान इन योजनाओं को बढ़ावा देने की बजाय इन्हें असफल करने पर तुला हुआ है। यह मामला न सिर्फ मरीजों की जेब पर बोझ डाल रहा है बल्कि सरकार को भी आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है। 2021-22 की ऑडिट रिपोर्ट में भी इस खरीद पैटर्न पर गंभीर आपत्ति जताई गई थी लेकिन संस्थान ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।