फाैज के शहीदों की तरह लाभ मिले
चरणजीत कौर के पति कश्मीर सिंह भी 27 जनवरी 1992 को आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। उन्हें भी बहादुरी पुरस्कार मिला मगर राज्य की ओर से सुविधाओं के लिए वे आज तक भटक रही हैं। फाैज में यदि कोई जवान शहीद होता है तो केंद्र व राज्य सरकार उनके आश्रितों को काफी लाभ देती है। इसी तरह पुलिस के शहीद जवान को भी मिलना चाहिए, क्योंकि पीड़ा और परेशानियां दोनों के आश्रितों के समक्ष एक जैसी होती हैं। एक्सग्रेशिया का आकलन ठीक से नहीं हुआ लिहाजा लाभ कम मिला। उन्हें कोई प्लाॅट भी नहीं मिला और पेंशन भी बहुत कम मिलती है।
घर फूंक दिया, पंजाब छोड़ना पड़ा
डाॅ. बीआर हस्तिर ने बताया कि उनके डीएसपी चाचा पंडित ताराचंद आतंकियों से लड़ते हुए 6 नवंबर 1987 को शहीद हुए। बटाला में कई बार उनके घर पर हमला हुआ और घर को आग लगा दी गई। दहशत की वजह से परिवार को पंजाब छोड़ना पड़ा। अंबाला और पानीपत के बाद दिल्ली में रहे। आतंकवाद का दाैर खत्म हुआ तो वापस अमृतसर आए। आश्रितों को कोई प्लाॅट नहीं हुआ। सुविधाओं के लिए बहुत से पीड़ित आज भी भटक रहे हैं।