प्रदेश पर इस समय 3.75 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। सरकार के कामकाज, 2022 में किए अपने चुनावी वायदों को पूरा करने, विकास का पहिया चलाते रहने और रंगला पंजाब से जुड़े नए बुनियादी ढांचे खड़े करने के लिए सरकार को मौजूदा वित्तीय वर्ष में भी 28 हजार करोड़ का कर्ज लेना पड़ा है। प्रदेश पर लगातार बढ़ते कर्ज का बोझ सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। विपक्षी दल भी सरकार को इस मुद्दे पर समय-समय पर घेरते नजर आते हैं। ऐसे में मान सरकार को अपने कार्यकाल के बचे हुए दो साल में सरकार की आर्थिक स्थिति को पहले के मुकाबले बेहतर करना होगा।
कर्ज लेने की सीमा को कम करना होगा और आय के नए स्रोत के जरिए राजस्व को बढ़ावा होगा। सरकार के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है केंद्र के साथ अपने रिश्तों में सुधार करना, जिसकी वजह से प्रदेश के करीब 10,500 करोड़ रुपये के फंड रुके हुए हैं। तीसरी बड़ी चुनौती प्रदेश इकाई को जमीनी स्तर पर अपने संगठनात्मक मजबूती के लिए कई बड़े बदलाव करने होंगे। बीते वर्ष के अंत में पंजाब आप प्रधान के रूप में कार्यभार संभालने वाले कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा के नेतृत्व में नगर निगम चुनाव हुए, लेकिन आप को अपना मेयर बनाने के लिए जमीनी स्तर पर काफी जद्दोजहद तक करनी पड़ी, आप को निगम चुनाव में पूर्ण बहुमत का अंदेश अधूरा दिखाई पड़ा।
दिल्ली-हरियाणा चुनाव का गजब का संयोग
हरियाणा-दिल्ली चुनाव में गजब का संयोग देखने को मिला है। दोनों ही जगह चुनाव,परिणाम और सीटें भी उतनी ही आई। हरियाणा में पांच अक्तूबर को विधानसभा चुनाव हुए और परिणाम आठ को आया। हरियाणा में भाजपा ने 48 सीटें जीती थीं। वहीं, दिल्ली में भी पांच अक्तूबर को मतदान हुआ। आठ को परिणाम आया और दिल्ली में भी भाजपा को 48 सीटें मिली। इस गजब संयोग को लेकर हरियाणा में काफी चर्चा है।
राजनीतिक विशेषज्ञ प्रोफेसर गुरमीत सिंह ने कहा, आम आदमी पार्टी का सबसे बड़ा गढ़ दिल्ली ही था जहां पार्टी का जन्म भी हुआ। दिल्ली के बाद जिस इकलौते राज्य में आप को सफलता मिली वह पंजाब है। इस दृष्टि से दिल्ली में आप की हार का सीधा असर पंजाब की राजनीति पर पड़ना लाजिमी है।