"कुड़ियां नूं बाहर ना भेजो... जिथे मुंडे खेडदे हण, उथे कुडी नूं क्यों ले जांदे हो?" यह वो कड़वे ताने थे, जो संगरूर जिले के गंडुआं गांव के किसान गुरलाल सिंह को रोज सुनने पड़ते थे। दो एकड़ जमीन के सहारे परिवार पालने वाले इस पिता के पास तब गांव के तानों का कोई जवाब नहीं था, लेकिन उनकी चमकती आंखों में एक जिद थी। आज उसी जिद ने इतिहास रच दिया है।
गुरलाल सिंह की 23 वर्षीय एथलीट बेटी रशदीप कौर का चयन राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भारतीय टीम में हो गया है। वह 4x400 मीटर रिले रेस में भारत की तरफ से हुंकार भरेगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान के इलाके की बेटी ने साबित कर दिया कि यदि हौसले बुलंद हों तो उड़ान भरने से कोई नहीं रोक सकता।
एक मां का वो 'गुप्त बलिदान' जो बेटी आज भी नहीं जानती। इस कामयाबी के पीछे सिर्फ पसीना नहीं, बल्कि मां के गहनों का त्याग भी छुपा है। रशदीप की मां गुरपिंदर कौर ने एक भावुक खुलासा करते हुए बताया कि एक बार रशदीप को बड़ी प्रतियोगिता में भेजने और टिकट का खर्च उठाने के लिए घर में पैसे नहीं थे। तब उन्होंने अपनी सोने की चेन बेच दी थी। भावुक होते हुए रशदीप की छोटी बहन ने बताया कि मां ने मुझसे कहा था कि यह बात दीदी (रशदीप) को कभी मत बताना, वरना वो खेल पर ध्यान नहीं दे पाएगी। रशदीप को इस बलिदान की भनक नहीं है पर उस दिन मैंने खुद से वादा किया था कि जब दीदी कामयाब होगी, तो हम उसके लिए कई सोने के हार खरीदेंगे।