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एयरफोर्स की गोल्डन एरो: कारगिल युद्ध में की थी हवाई जासूसी, चांद की रोशनी में बरसाए थे बम

Thu, 13 Aug 2026 07:00 AM IST
शाहिल शर्मा मोहित धुपड़, चंडीगढ़

सार

27 जून 1999 को जब मुश्कोह घाटी में अंधेरा छाया हुआ था, तब भारतीय वायुसेना के छह मिग 21-एम फाइटर जेट नियंत्रण रेखा के साथ चांद की रोशनी से जगमगाती घाटी में काफी नीचे की ओर तेजी से आगे बढ़े और  दुश्मन के ठिकानों पर भारी बमबारी की। 
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टाइगर हिल पर किए गए हलमे का फुटेज - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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इंडियन एयरफोर्स की सबसे खतरनाक माने जाने वाली स्क्वाड्रन नंबर 17 ‘गोल्डन एरो’ इन दिनों खासी चर्चा में है। ऑपरेशन सफेद सागर : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ द कारगिल वॉर वेब सीरीज के बाद एक बार फिर इस स्क्वाड्रन के पराक्रम को सलाम किया जा रहा है। कारगिल युद्ध के दौरान इस स्क्वाड्रन की कमान संभाल रहे पूर्व वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ भी खासे उत्साहित हैं।
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दरअसल, पहाड़ों पर छिपे दुश्मन की पहचान करना, उसकी पोजीशन की फोटो रिकॉनिसेंस करना (दुश्मन के ठिकानों की टोह लेने के लिए फोटो लेना), हवाई हमलों के लिए लक्ष्य उपलब्ध कराना, हमलों के बाद उनका आकलन करना और जरूरत पड़ने पर खुद स्ट्राइक मिशन करना... यह थी कारगिल युद्ध में गोल्डन एरो की भूमिका। 

धनोआ कहते हैं कि यह सबसे चुनौतीपूर्ण मिशन था, जिसे इंडियन एयरफोर्स के जांबाजों ने बखूबी निभाया। अंबाला में ही इंडियन एयरफोर्स ने 1 अक्तूबर 1951 में इस स्क्वाड्रन का गठन किया था। यह स्क्वाड्रन उस वक्त भी टोही विमान हार्वर्ड-11 बी विमान संभालती थी। यानी शुरुआत दौर से ही गोल्डन एरो का मिशन सामरिक टोह (दुश्मन के अड्डों की हवाई जासूसी) से जुड़ा था। 
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साल 1955 में इस स्क्वाड्रन ने वैम्पायर, 1957 में हॉकर हंटर व 1975 में मिग 21-एम का बेड़ा संभाला। साल 1999 के कारगिल युद्ध में ऑपरेशन सफेद सागर के दौरान भी गोल्डन एरो ने मिग 21-एम लड़ाकू विमानों का उपयोग करके फोटो-रिकॉनिसेंस (हवाई टोह) और स्ट्राइक मिशनों को अंजाम दिया था।
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फिर जिंदा क्यों हुई गोल्डन एरो?
धीरे-धीरे मिग 21-एम एयरफोर्स के बेड़े से हटाए जाने के बाद भले ही गोल्डन एरो को साल 2016 नंबर प्लेटेड (अस्थायी रूप से सेवा समाप्त करना) कर दिया गया था लेकिन उसका सफर यहीं खत्म नहीं हुआ। 10 सितंबर 2019 को घातक लड़ाकू विमान राफेल की संभाल के लिए अंबाला में ही इसे फिर सक्रिय किया गया। 

सैन्य सूत्र बताते हैं कि उस समय बीएस धनोआ भारतीय वायुसेना प्रमुख थे और उनकी प्रबल इच्छा थी कि एयरफोर्स के सबसे घातक लड़ाकू विमान की कमान वही स्क्वाड्रन संभाले, जिसने उनके नेतृत्व में कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन के दांत खट्टे करवाए थे। भारत में राफेल पहुंचे और अंबाला एयरफोर्स स्टेशन पर इस स्क्वाड्रन को सौंपे गए। दुश्मन आज भी इस स्क्वाड्रन का पुराना इतिहास याद कर थर्राता है।

कारगिल का चुनौतीपूर्ण मिशन
27 जून 1999 को जब मुश्कोह घाटी में अंधेरा छाया हुआ था, तब भारतीय वायुसेना के छह मिग 21-एम फाइटर जेट नियंत्रण रेखा के साथ चांद की रोशनी से जगमगाती घाटी में काफी नीचे की ओर तेजी से आगे बढ़े।  उन्होंने दुश्मन को कुछ समझने का मौका दिए बिना पहाड़ी चोटियों पर दुश्मन के ठिकानों पर भारी बमबारी की और देखते ही देखते ओझल हो गए। गोल्डन एरो का यह पहला ऐसा मिशन था। इससे पहले भी इस स्क्वाड्रन ने एलओसी के पास कम ऊंचाई पर दुश्मन के ठिकानों के फोटो के जरिये टोह लेने के मिशन चलाए थे। 

इस स्क्वाड्रन की सटीक जानकारी के बाद ही कारगिल युद्ध में दुश्मन को हराने में बड़ी मदद मिली थी। चूंकि मिग 21-एम पर रेडियो ट्रांसमिशन सुरक्षित नहीं थे, इसलिए पायलटों द्वारा बम गिराए जाने तक रेडियो सन्नाटा बनाए रखा जाता था। यहां तक कि जब विमान रनवे पर कतारबद्ध होते थे, तब भी एयर ट्रैफिक कंट्रोल के साथ कोई रेडियो संचार नहीं होता था। केवल कंट्रोलर द्वारा हरी बत्ती का जलना ही उड़ान भरने का इशारा होता था।
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