हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम के तहत अपराध तभी बनता है, जब कथित अपमान किसी सार्वजनिक स्थान पर हुआ हो। निजी टेलीफोन वार्ता इस कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरती है। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि घटना सार्वजनिक स्थान पर नहीं हुई। इसका कोई प्रत्यक्षदर्शी भी नहीं था।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
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अदालत ने कहा कि फोन पर जातिसूचक शब्द कहना सार्वजनिक दृष्टि में अपमान नहीं माना जाएगा। ऐसे मामलों में एससी-एसटी एक्ट की संबंधित धाराएं लागू नहीं होंगी।
न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने इस आधार पर जालंधर में दर्ज एक एफआईआर रद्द कर दी। इससे संबंधित सभी आपराधिक कार्रवाई भी समाप्त कर दी गई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम के तहत अपराध तभी बनता है, जब कथित अपमान किसी सार्वजनिक स्थान पर हुआ हो। निजी टेलीफोन वार्ता इस कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरती है। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि घटना सार्वजनिक स्थान पर नहीं हुई। इसका कोई प्रत्यक्षदर्शी भी नहीं था।
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कानून में सार्वजनिक दृष्टि का महत्व
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि कानून में सार्वजनिक दृष्टि शब्द का विशेष महत्व है। यदि अपमान केवल फोन पर दो व्यक्तियों के बीच सीमित है तो उसे सार्वजनिक स्थान पर किया गया अपमान नहीं माना जा सकता।
सर्वोच्च न्यायालय भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है। एससी-एसटी एक्ट के लिए कथित अपमान का सार्वजनिक दृष्टि में होना आवश्यक है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ कार्रवाई जारी रखना न्यायसंगत नहीं माना।