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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वीडियो गेमिंग की लत को बताया मानसिक विकार, जानें क्या है ये बीमारी

Tue, 19 Jun 2018 01:41 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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दुनिया के हर माता-पिता अपने बच्चों को वीडियो गेम ना खेलने की नसीहत देते रहते हैं लेकिन बच्चे जिद करके यह बात नहीं मानते। घर के बाहर खेलने से बच्चों का शारीरिक विकास होता है लेकिन जब से उन खेलों की जगह वीडियो गेम ने ली है तब से बच्चों के संपूर्ण विकास पर इसका असर साफ दिखाई देने लगा है।
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ऐसे लोग हो सकते हैं पीड़ित

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अकसर माता-पिता के ऐसा कहने पर बच्चे कह देते हैं कि इससे कोई नुकसान नहीं होता और वापिस गेम खेलना शुरू कर देते हैं लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ)  की ये रिपोर्ट ने इसे जानलेवा बताया है । दरअसल, डब्लूएचओ ने गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य विकार के रूप में घोषित कर दिया है। 
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डब्लूएचओ ने गेमिंग डिसऑर्डर यानि इंटरनेट गेम से उत्पन्न विकार को मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर अवस्था के रूप में अपने इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज (आईसीडी) में शामिल कर लिया है। आईसीडी डब्लूएचओ द्वारा प्रकाशित होने वाली एक नियमावली है जिसे पिछले 10 वर्षों से अपडेट किया जा रहा है। इसमें जख्मों, बीमारियों और मौत के कारणों के करीब 55,000 यूनिक कोड हैं।

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आईसीडी के प्रकाशित होने पर डब्ल्यूएचओ के निदेशक-जनरल टेड्रोस एधनोम घेब्रयेसस ने एक बयान में कहा है कि इससे हमें ये समझने में मदद मिलेगी कि ऐसी कौन सी चीजें हैं जो लोगों को बीमार बनाती हैं और उनकी जान चली जाती है। साथ ही इससे यह भी जानने में सहायता मिलेगी कि इन बीमारियों पर कार्रवाई करके लोगों की जान कैसे बचाई जाए।
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इस बार जारी किए गए आईसीडी नियमावली के नए संस्करण आइसीडी-11 को पूर्ण रूप से इलेक्ट्रॉनिक बनाया गया है ताकि दुनिया भर के डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों तक इसकी पहुंच हो सके। साल 2019 के मई में आयोजित होने वाले विश्व स्वास्थ्य सम्मेलन में आईसीडी-11 को प्रस्तुत किया जाएगा।
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सदस्य देशों के इसे अपना लेने के बाद यह जनवरी 2022 से लागू होगा। यह ना केवल डॉक्टरों बल्कि सरकारों और परिवारों को भी अधिक सतर्क करेगा और उन्हें आने वाले खतरे के प्रति सावधान करेगा। जिससे इस विकार से पीड़ित लोगों को समुचित मदद मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। डब्लूएचओ और अन्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस प्रकार के मामले काफी कम हैं। यह माना जा सकता है कि दुनिया में केवल 3 फीसदी गेमर्स ही ऐसे हैं जो इस बीमारी से ग्रसित हो सकते हैं। 
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डब्लूएचओ ने अपने दिए बयान में कहा कि दुनियाभर के लाखों गेमर्स की पहचान गेमिंग डिसॉर्डर से पीड़ितों के रूप में कभी नहीं होगी, भले ही वह गेम के प्रति अधिक अासक्त हों। यह अवस्था ऐसे बहुत ही कम लोगो में पाई जाती है जो बलपूर्वक गेम खेलते है। संगठन के बयान में यह भी कहा गया है कि यदि कोई इस बीमारी से पीड़ित हो जाता है तो उसमें इस रोग की पहचान कोई कुशल डॉक्टर ही कर सकता है।
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