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कहानी उस रामलीला की: जहां तीर लगते ही सच में हो गई थी 'लंकेश' की मौत, दशहरा पर नहीं होता है रावण दहन

Fri, 27 Sep 2024 05:51 PM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला नेटवर्क, पीलीभीत
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रामलीला मैदान में लगी प्रतिमा, उत्तर दिशा में बना है अयोध्या भवन - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के बीसलपुर की रामलीला का अपना अलग इतिहास है। लोग इसे सच्ची रामलीला भी कहते हैं। यहां वर्ष 1987 में लीला मंचन के दौरान रावण बने कलाकार की सच में मौत हो गई थी। इस घटना ने परंपरा को बदल दिया। तब से यहां रावण वध का मंचन दशहरा के एक दिन बाद होता है। अगर उस दिन शनिवार पड़ गया तो रावण दहन तीसरे दिन होगा। ऐतिहासिक रामलीला में नगर के मोहल्ला दुर्गाप्रसाद के एक परिवार के ही लोग रावण की भूमिका निभा रहे हैं। मेला मैदान में अयोध्या, पंचवटी, शिवकुटी, लंका और अशोक वाटिका के पक्के भवन बने हुए हैं। लीला मंचन के दौरान इन भवनों का इस्तेमाल किया जाता है। 
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रामलीला मैदान में बना लंका भवन - फोटो : अमर उजाला
मोहल्ला दुर्गाप्रसाद निवासी 56 वर्षीय दिनेश रस्तोगी ने बताया कि वह वर्ष 1987 से मेले में रावण की भूमिका निभा रहे हैं। उससे पहले उनके पिता गंगा विष्णु उर्फ कल्लूमल ने वर्ष 1940 से 1987 तक मेले में रावण की भूमिका निभाई थी। वर्ष 1987 में रावण वध लीला के समय उनके पिता का मेला मैदान में ही निधन हो गया था। 
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रावण की प्रतिमा - फोटो : अमर उजाला
बताते हैं कि कल्लूमल की इच्छा थी कि उनका निधन लीला मंचन के दौरान ही हो। इत्तफाक से रावण वध मंचन के दौरान ऐसा हो भी गया। रावण के किरदार में उनकी प्रतिमा मेला कमेटी की ओर से बनवाकर मेला मैदान में स्थापित की गई है। यह प्रतिमा लंका भवन की तरफ लगी है। 

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रामलीला मैदान में लगी रावण के किरदार में कल्लूमल की प्रतिमा - फोटो : अमर उजाला
दिनेश रस्तोगी ने बताया कि उससे पहले वर्ष 1931 से 1940 तक उनके ताऊ चंद्रसेन ने मेले में रावण की भूमिका निभाई थी। वर्ष 1922 से 1931 तक मोहल्ला दुबे के बाबूराम वर्मा ने मेले में रावण की भूमिका निभाई थी। वर्ष 1915 से 1922 तक गांव चौसरा के मोती महाराज ने मेले में रावण की भूमिका निभाई थी। इस प्रकार वर्ष 1930 से अब तक एक ही परिवार के लोग मेले में रावण की भूमिका निभा रहे हैं।
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विष्णु गोयल - फोटो : अमर उजाला
बीसलपुर का रामलीला मेला 125 वर्ष पुराना है। मेला कमेटी के उपाध्यक्ष 90 वर्षीय विष्णु गोयल ने बताया कि करीब सवा सौ वर्ष पूर्व बदायूं से यहां आकर बसे कटहरिया जाति के लोगों ने मेला शुरू कराया था। वे लोग गुलेश्वर नाथ मंदिर के पास पशु चराते समय रामलीला का अभिनय अपने स्तर से करते थे। 
 
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अयोध्या भवन - फोटो : अमर उजाला
तत्कालीन तहसीलदार भूपसिंह ने कटहरिया जाति के इन चरवाहों की भावनाओं को महसूस करते हुए इनके अभिनय को वास्तविकता में बदलवा दिया। प्रारंभ के कुछ वर्षो में यह मेला छोटे से मंच पर होता रहा। बाद में विशाल मैदान में होने लगा। यहां रामलीला मंच पर नहीं बल्कि विशाल मैदान पर इसका मंचन होता है। पात्र मैदान में घूमघूम कर अपनी भूमिका अदा करते हैं। 
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अयोध्या भवन - फोटो : अमर उजाला
लीला मंचन के लिए मेला कमेटी के पास एक विशाल मैदान है। इसके उत्तर दिशा में अयोध्या बनी है, दक्षिण दिशा में लंका भवन है। मैदान के बीच में पंचवटी बनी हुई। रामलीला के दौरान मैदान के चारों और लोहे का मजबूत जाल लगाया जाता है। दर्शकों के बैठने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई हैं। 
 
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रामलीला मैदान में बनी पंचवटी - फोटो : अमर उजाला
15 दिन रासलीला भी होती है 
विष्णु गोयल ने बताया कि इस साल 28 सितंबर से मेला शुरू हो रहा है। करीब एक महीने तक चलने वाले मेले के आखिर में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन व मुशायरा भी होता है। रावण वध लीला के बाद मेला परिसर में करीब 15 दिन रासलीला भी होती है, जिसका मंचन वृंदावन के कलाकार करते हैं। 

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