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Mahashivratri 2023: गोमती नदी तट पर है अनूठा बाबा इकोहत्तरनाथ मंदिर, दिन में कई बार रंग बदलता है शिवलिंग

Wed, 15 Feb 2023 06:39 AM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
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बाबा इकोहत्तरनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
पीलीभीत के पूरनपुर क्षेत्र में स्थित बाबा इकोहत्तरनाथ मंदिर में महाशिवरात्रि, पूर्णिमा, अमावस्या के अलावा सावन के महीने में श्रद्धालुओं की जबरदस्त भीड़ रहती है। मान्यता है कि इस मंदिर का प्राचीन और दुर्लभ शिवलिंग दिन में कई बार रंग बदलता है। यहां भगवान इंद्र स्वयं पूजा करने आते हैं। सुबह जब मंदिर के पट खुलते हैं, तो शिवलिंग पर ताजे फूल चढ़े मिलते हैं। 

पूरनपुर से करीब 10 किलोमीटर दूर सिरसा जंगल में गोमती नदी के तट पर बना एकोहत्तरनाथ मंदिर में क्षेत्र के अलावा दूर-दराज से लोग दर्शन करने पहुंचते हैं। जन श्रुतियों के अनुसार जब देवराज इंद्र को गौतम ऋषि ने शरीर के एक हजार टुकड़े होने का श्राप दिया था, तब मोक्ष का उपाय पूछने पर एक हजार शिवलिंग की स्थापना करने के लिए उनसे कहा गया। तब इंद्रदेव ने विभिन्न स्थानों पर शिवलिंग की स्थापना के साथ सिरसा जंगल में एक स्थान पर बचे शिवलिंगों को स्थापित कर दिया। यहां मनौती पूरी होने पर घंटा चढ़ाने और हैंडपंप लगवाने की परंपरा है।
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बाबा इकोहत्तरनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
बाबा इकोहत्तरनाथ मंदिर की वर्षों से प्रेम गिरि और उनके भतीजे निरंकार गिरि पूजा कर रहे है। निरंकार गिरि ने बताया कि मंदिर में उनके पूर्वज भी पूजा करते थे। यह सिलसिला निरंतर जारी है। 
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मंदिर में घंटा चढ़ाने की है परंपरा - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने बताया कि आज तक मंदिर में सबसे पहले कोई पूजा नहीं कर सका। यहां तक कि उनके पूर्वज तक पहले पूजा नहीं कर सके। मंदिर में देवता पूजा करने आते है। मंदिर का गेट खोलने पर पहले पूजा हुई मिलती है। ताजे फूल चढ़े मिलते हैं।

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बाबा इकोहत्तरनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला

पूरनपुर से ऐसे पहुंच सकते हैं मंदिर

पूरनपुर से मंदिर पहुंचने को असम हाईवे के खुटार चौराहा से गांव सिरसा होते हुए जंगल की ओर रास्ता है। जो मंदिर तक पहुंचता है। मगर यह रास्ता नए लोगों के लिए जटिल है। इसके अलावा सिमरिया होते हुए मंदिर पहुंचने के रास्ते हैं। 

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बाबा इकोहत्तरनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
मैंगलगंज हाईवे से गांव गुलड़िया भूपसिंह के समीप से मंदिर को जंगल किनारे तक जाने वाला सीधा पक्का रास्ता है। इस रास्ते से जंगल भी कम पड़ता है। गोमती नदी के तट पर स्थित इस प्राचीन मंदिर के आसपास प्राकृतिक संदुरता देखती ही बनती है। 
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