हिंदी में कालजयी रचानाओं ने जिसे महाकवि की उपाधि दिलाई, उन्हीं महाकवि देव की स्मृतियां गुमनामी में कैद हैं। उनकी रचनाएं भी देव स्मारक की अलमारियों में तन्हाई की सजा काट रही हैं। उनमें दीमक लग चुकी है। प्रशासन की अनदेखी के चलते हिंदी के विकास में अपना जीवन न्यौछावर करने वाले एक महाकवि देव की स्मृतियां अब दम तोड़ रही हैं, लेकिन किसी को इनकी परवाह नहीं है। हिंदी दिवस पर अपने कवि का ऐसा अपमान देख हिंदी भी उदास है।
मैनपुरी में जन्मे महाकवि देव को यूं ही महाकवि की उपाधि नहीं मिली। कुसमरा में सन 1673 में पंडित बिहारीलाल दुबे के घर इस महाकवि का जन्म हुआ था। बचपन से ही हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाले महाकवि का पूरा नाम देवदत्त दुबे था। 16 वर्ष की आयु में देवदत्त दुबे ने पहला हिंदी ग्रंथ रचा, जिसे भाव विलास नाम दिया। शायद तब किसी को नहीं पता था कि वे रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाएंगे। एक बार लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ तो अनवरत जारी रहा।
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स्मारक में रखीं महाकवि देव की रचनाएं
- फोटो : अमर उजाला
उन्होंने एक के बाद एक 72 कालजयी ग्रंथों की रचना की, जो हिंदी साहित्य में अमर हो गए। हालांकि वर्तमान में उपलब्धता केवल 15 ग्रंथों की ही है। इसी लेखन और हिंदी के योगदान ने उन्हें महाकवि का दर्जा दिलाया और देवदत्त से वे महाकवि देव बन गए। 95 साल की आयु तक उन्होंने लेखन जारी रखा, लेकिन हिंदी के चमकते सितारे महाकवि देव की स्मृतियां आज गुमनामी में कैद हैं। वहीं उनकी कालजयी कही जाने वाली रचनाएं कुसमरा में बने देव स्मारक की अलमारियों में तन्हाई की सजा काट रही हैं।
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कुसमरा में स्थित महाकवि देव का स्मारक
- फोटो : अमर उजाला
69 साल से लोकार्पण की बाट जोह रहा स्मारक
महाकवि देव की याद में कुसमरा में 1953 में एक देव स्मारक का निर्माण कराया गया था। इसका शिलान्यास तत्कालीन राज्यपाल केएम मुंशी ने किया था, लेकिन आज तक इसका लोकार्पण नहीं हो सका। धीरे-धीरे जब स्मारक जर्जर हो गया तो इसका जीर्णोद्धार भी सरकार ने कराया। सपा शासन काल में 2013-14 में सरकार ने 15 लाख रुपये की धनराशि से इसका जीर्णोद्धार कार्य हुआ, लेकिन इसके बाद भी इसका लोकार्पण नहीं हो सका। धीरे-धीरे फिर भवन जर्जर होने लगा है।
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महाकवि देव के वंशज
- फोटो : अमर उजाला
परिजनों को खटकता है रीतिकाल के महाकवि का अपमान
महाकवि देव की नौवीं पीढ़ी के वंशज नित्यानंद दुबे वर्तमान में कुसमरा में ही निवास करते हैं। उन्हें रीतिकाल के महाकवि कहे जाने वाले देव का अपमान खटकता है। वे कहते हैं उनके वंशज महाकवि देव ने हिंदी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन आज तक शासन और प्रशासन ने उनका सम्मान नहीं किया। हिंदी दिवस हो या फिर जयंती कभी प्रशासन ने न तो उन्हें याद किया और न ही कोई सम्मान दिया।