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Corporate vs Retail Health Insurance: कंपनी वाला बीमा बेस्ट है या पर्सनल हेल्थ इंश्योरेंस? जानें अंतर

Tue, 23 Jun 2026 07:04 PM IST
Shikhar Baranawal यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Corporate vs Retail Health Insurance: जो लोग प्राइवेट कंपनियों या कॉर्पोरेट ऑफिसों में काम करते हैं, उन्हें आमतौर पर कंपनी की तरफ से मुफ्त में बीमारी का बीमा (हेल्थ इंश्योरेंस) मिल जाता है। ऐसे में उनके मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब कंपनी ने बीमा दे ही रखा है, तो क्या अलग से खुद का पर्सनल हेल्थ इंश्योरेंस लेना जरूरी है? आइए इस लेख में समझते हैं।
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कॉर्पोरेट बनाम रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस - फोटो : AI
Corporate vs Retail Health Insurance: आजकल के जमाने में बीमारी का इलाज इतना महंगा हो गया है कि अस्पताल का खर्चा उठाना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में 'हेल्थ इंश्योरेंस' यानी बीमारी का बीमा हम सबके लिए एक मजबूत ढाल की तरह काम करता है। जो लोग कंपनियों या फैक्ट्रियों में नौकरी करते हैं, उन्हें अक्सर कंपनी की तरफ से फ्री में बीमा मिल जाता है।

इसे देखकर ज्यादातर लोग बैठ जाते हैं और अपने लिए अलग से कोई दूसरा बीमा नहीं खरीदते। मगर क्या सिर्फ कंपनी के भरोसे बैठना आपके और आपके परिवार के लिए सही है? सच तो यह है कि कंपनी वाले बीमे में कई तरह की शर्तें और सीमाएं होती हैं। अगर आप इन्हें समय रहते नहीं समझेंगे, तो अचानक बीमारी आने पर आपको अपनी जेब से लाखों रुपये भरने पड़ सकते हैं।
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health insurance new - फोटो : Adobe stock
नौकरी छूटने या बदलने पर खत्म हो जाता है जोखिम
दरअसल, कंपनी द्वारा दिया गया बीमा सिर्फ तब तक ही काम आता है जब तक आप उस कंपनी में नौकरी कर रहे हैं। अगर आप नौकरी बदलते हैं, आपकी नौकरी छूट जाती है या आप रिटायर होते हैं, तो उसी दिन से आपका यह हेल्थ इंश्योरेंस पूरी तरह खत्म हो जाता है। नई नौकरी ज्वाइन करने या नया पर्सनल बीमा लेने के बीच के समय में अगर कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए, तो आपको भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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पॉलिसी की शर्तों और रूम रेंट पर लगी होती है कैपिंग - फोटो : Adobe Stock
पॉलिसी की शर्तों और रूम रेंट पर लगी होती है कैपिंग
कॉर्पोरेट पॉलिसी में अक्सर रूम रेंट कैपिंग (अस्पताल के कमरे के किराए की सीमा) और को-पेमेंट जैसी कई कड़ी शर्तें छिपी होती हैं। उदाहरण के लिए, अगर आपकी कंपनी की पॉलिसी में रूम रेंट की सीमा सिर्फ ₹3,000 प्रतिदिन है और आप ₹5,000 वाले कमरे में भर्ती होते हैं, तो बाकी का खर्च और उसके अनुपात में डॉक्टर की फीस का बड़ा हिस्सा आपको खुद ही चुकाना पड़ सकता है या आपके पॉलिसी के शर्तों जो नियम होगा उसके मुताबिक चुकाना पड़ेगा।

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कम कवर और माता-पिता के इलाज में आती है दिक्कत - फोटो : AdobeStock
कम कवर और माता-पिता के इलाज में आती है दिक्कत
कंपनियां आमतौर पर ₹2 लाख से ₹5 लाख तक का ही ग्रुप इंश्योरेंस देती हैं, जो आज के समय में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बहुत कम है। इसके अलावा, कई कंपनियां अब कर्मचारियों के बुजुर्ग माता-पिता को इस पॉलिसी में शामिल नहीं करती हैं या फिर उनके इलाज के खर्च पर मोटी कटौती लगा देती हैं, जिससे ऐन वक्त पर जेब खाली हो जाती है।
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पर्सनल हेल्थ इंश्योरेंस के फायदे - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
पर्सनल हेल्थ इंश्योरेंस के फायदे
खुद का पर्सनल (रिटेल) हेल्थ इंश्योरेंस लेने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह आपकी नौकरी से नहीं जुड़ा होता और जीवनभर चलता रहता है। इसमें आप अपनी जरूरत के हिसाब से बड़ा सम एश्योर्ड (बीमा राशि) चुन सकते हैं। साथ ही, कम उम्र में पर्सनल पॉलिसी शुरू करने पर नो-क्लेम बोनस का फायदा मिलता है और पुरानी बीमारियों का वेटिंग पीरियड भी समय के साथ खत्म हो जाता है।
 
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