Mariappan Thangavelu
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मां ने सब्जी बेची, बेटे ने अखबार बेच कर पाया मुकाम
रियो पैरालंपिक में ऊंची कूद के स्वर्ण पदक विजेता मरियप्पन थांगावेलु का देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न तक पहुंचने का सफर काफी चुनौतीपूर्ण रहा है। तमिलनाडु में सेलम जिले के थांगावुल जब छोटे थे तो पिता परिवार को छोड़कर चले गए। घर और तीन बच्चों की जिम्मेदारी मां के ऊपर आ गई। मां ने घर चलाने के लिए सब्जी बेची तो बेटे मरियप्पन ने उनकी मदद के लिए सुबह लोगों के घर अखबार डाला तो दिन में दिहाड़ी की।
वह कहते हैं मैं दो से तीन किलोमीटर चलकर अखबार डालता था। इसके बाद निर्माणाधीन जगहों पर जाता था। मुझे हर दिन 200 रुपये मिलते थे। मां की मदद के लिए मुझे यह करना पड़ता था। थांगावेलु जब स्कूल में पढ़ते थे, तभी उन्हें खेलों के बारे में पता चला था। वर्ष 2013 में कोच आर सत्यनारायण ने राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उनकी प्रतिभा को देखा, तब वह 18 साल के थे। दो साल बाद थांगावेलु को बंगलूरू लाया गया और फिर इतिहास बन गया। उन्होंने न सिर्फ अपनी किस्मत बदली बल्कि मां, भाई और बहन की भी तकदीर बदल दी। साई ने उन्हें ग्रुप ए पद का कोच बना दिया है।