दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा मस्ती भरे मन की, भोली सी आशा, चांद तारों को छूने की आशा, आसमानों में उड़ने की आशा... रोजा फिल्म के इस गाने की तरह इन बेटियों की तमन्ना भी कुछ ऐसी ही है। अपने हौसले और कड़ी मेहनत से यह बेटियां तमाम बाधाओं और दुष्वारियों को पार करते हुए ऊंची उड़ान उड़ने को बेताब हैं।
महाराष्ट्र में हाल ही में हुए खेलो इंडिया यूथ खेलों ने तो इनकी उम्मीदों को नए पंख लगा दिए हैं। अब यह बेटियां अपनी नई पहचान बनाकर आर्थिक रूप से कमजोर अपने माता-पिता का बोझ भी कम करने का दंभ भरने लगी हैं। राष्ट्रीय बालिका दिवस पर आइये मिलते हैं कुछ ऐसी ही बहादुर बेटियों से जो भविष्य की नई उम्मीद बनकर उभरीं हैं।
खेल-खेल में पापा को गोद में उठाने वाली सृष्टि बन गई चैंपियन
उत्तर प्रदेश के मेरठ के सैनी गांव के ऑटो चालक सतीश चौधरी और ममता की वेटलिफ्टर बिटिया सृष्टि ने अंडर-17 वर्ग के 55 किग्रा भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर सोना जीतकर माता-पिता का सिर फख्र से ऊंचा कर दिया। राज्य और स्कूली खेलों में कई पदक जीत चुकीं सृष्टि कहती हैं मैं मम्मी-पापा को हर खुशी देना चाहती हूं। सात साल की उम्र में खेल-खेल में पापा को गोद में उठाने वाली सुष्टि राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर उनके सपने को साकार करना चाहती हैं। बिटिया के इसी हुुनुर को देखकर पिता ने उन्हें खेलों के लिए प्रोत्साहित किया। सृष्टि चाहती हैं कि पिता ने ऑटो के लिए जो कर्ज ले रखा है वह उसे चुकाने में उनकी मदद करे।
करिश्मा का करिश्मा
आगरा के ऑटो चालक की जिम्नास्ट बेटी करिश्मा ने अंडर-21 वर्ग की बीम स्पर्धा में पीला तमगा जीतकर सबको दंग कर दिया। 2018 राष्ट्रीय स्कूली खेलों में भी स्वर्ण पदक जीत चुकीं संत आशा राम इंटर कॉलेज की छात्रा करिश्मा का अगला लक्ष्य राष्ट्रीय चैंपियनशिप है। दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में अभ्यास करने वालीं करिश्मा कहती हैं सभी खिलाड़ियों की तरह मेरा लक्ष्य भी ओलंपिक है। पर मुझे यह भी पता है कि यह सब इतना आसान नहीं। मैं धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की और बढ़ूगी। मुझे पूरा भरोसा है कि मैं अपनी जिद और जुनून से मंजिल को हासिल कर लूंगी।
दिक्कतें भी नहीं रोक पाईं भारती की राह
आगरा जिले के तेहरा गांव की पहलवान भारती बघेल (55 किग्रा) अंडर-21 वर्ग में चैंपियन बनीं। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद किसान की बिटिया भारती ने हार नहीं मानी और आगे बढ़ती रहीं। राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीतने वाली फर्स्ट ईयर की यह छात्रा अपने पिता का बोझ कम करना चाहती हैं। वह कहती हैं घर में छह भाई-बहनें हैं। गुजारा बड़ी मुश्किल से होता है बावजूद इसके मुझे कोई कमी नहीं आने दी जाती। पर मेरी भी तो कुछ जिम्मेदारियां हैं।
जुनून का दूसरा नाम बवलीन
इस माह अपना 16वां जन्मदिन मनाने वाली जम्मू की जिम्नास्ट बवलीन कौर ने तीन स्वर्ण और दो रजत सहित कुल पांच पदक जीते। पर्याप्त प्रशिक्षण सुविधाओं और उपकरणों की कमी के बावजूद जम्मू की इस जिम्नास्ट ने साबित कर दिया कि कुछ करने की जिद और जुनून से हर मुकाम हासिल किया जा सकता है। बवलीन ने पिछले साल खेलो इंडिया स्कूल गेम्स में भी दो स्वर्ण सहित चार पदक जीतने के साथ ही राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी जम्मू एंड कश्मीर को चैंपियन बनाया था। अपनी सफलता का श्रेय अपने प्रशिक्षकों को देने वाली बवलीन कहती हैं यह तो अभी शुरुआत है। मेरी मंजिल अभी दूर है। मेरी निगाह अब 2022 राष्ट्रमंडल खेलों पर है।
जलपरी केनिशा
मुंबई की 15 वर्षीय जलपरी केनिशा गुप्ता ने अंडर-17 वर्ग की तैराकी स्पर्धा में गोल्डन हैट्रिक लगाकर भारतीय तैराकी को नई पहचान दिलाई है। उन्होंने 200 मीटर मैडले, 50 मीटर और 100 मीटर फ्रीस्टाइल में स्वर्ण पदक जीते। पंद्रह वर्षीय केनिशा को सात साल पहले माता-पिता ने इसलिए स्विमिंग पूल में उतरा ताकि वह अच्छी नींद सो सके। पर अब यही पूल मुंबई की केनिशा की जिंदगी बन गया है।
पापा का बोझ कम करना चाहती हैं निशू
हरियाणा के जींद जिले के दरोदी गांव की निशू अंडर-17 वर्ग के 53 किग्रा भार वर्ग में चैंपियन बनीं। राष्ट्रीय स्कूली खेलों में भी पदक जीत चुकी ट्राला ड्राइवर सुरेश की 16 वर्षीय बिटिया का अगला लक्ष्य सीनियर स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने का है। वह कहती हैं मैं खुद अपनी पहचान बनाना चाहती हूं। पापा का हाथ बंटाना चाहती हूं। उनको भाई की कमी का अहसास नहीं होने देना चाहती जिसकी 14 साल की उम्र में मौत हो गई थी। हम अभी तक इससे उबरे नहीं हैं पर जिंदगी तो चलती रहती है।
ऊंची उड़ान भरने को तैयार नन्ही
हरियाणा के रोहतक के तुराना गांव के किसान पाल सिंह की बिटिया नन्ही अपनी मंजिल की तलाश में सात साल की उम्र में ही मां-बाप से दूर चचेरे भाई सुरेंद्र के पास हिसार आ गई थी। स्कूल में खो-खो और लांग जंप से कॅरिअर की शुरुआत करने वाली नन्ही 400 मीटर बाधा दौड़ की चैंपियन बन चुकी हैं। जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमक बिखेरने के बाद नन्ही अब पटियाला में फेडरेशन कप से सीनियर स्तर पर अपनी नई पारी शुरू करने को बेताब हैं। वह कहतीं हैं थोड़ी घबराहट तो है पर एक अलग अहसास भी है। मैं कड़ी मेहनत कर रही हूं और पूरी उम्मीद है कि मेरा आगाज शानदार होगा।
प्राची की लक्ष्य टोक्यो ओलंपिक
दिल्ली के मनुरिका की 16 वर्षीय तैराक प्राची टोक्स की निगाह अब 2020 टोक्यो ओलंपिक पर है। अंडर-17 वर्ग में गोल्डन हैट्रिक लगाने वाली प्राची आठ तक आठ स्वर्ण, पांच रजत और छह कांस्य सहित कुल 19 पदक अपने नाम कर चुकी हैं। प्राची के पिता हरपाल सिंह का सपना है कि उनकी बिटिया न सिर्फ टोक्यो के लिए क्वालिफाई करे बल्कि पदक भी जीते। इसके लिए वह प्राची को ऑस्ट्रेलिया ट्रेनिंग के लिए भेजेंगे। प्राची कहती हैं कि पापा के सपने को साकार करने के लिए पूरी जी जान लगा दूंगी। मुझे अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा है।
परिजनों के विरोध के बावजूद सोनिया बनी रिंग की रानी
हरियाणा के भिवानी जिले के निमरी गांव के किसान जय भगवान की 21 वर्षीय बिटिया सोनिया चहल (57 किग्रा) भारतीय मुक्केबाजी की नई सनसनी बन गई हैं। दिल्ली में पिछले साल नवंबर में हुई विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में सोनिया धुरंधर खिलाड़ियों को मात देकर फाइनल में पहुंचीं। हालांकि वह स्वर्ण से चूक गई, लेकिन अपने पहले ही विश्व चैंपियनशिप में रजत जीतकर उन्होंने कीर्तिमान रच दिया। वर्ष 2012 में 14 साल की उम्र में परिजनों के विरोध के बावजूद रिंग में उतरीं सोनिया ने अपने जिद और जुनून से जल्द ही सबको अपना मुरीद बना लिया। तभी तो अब पिता बड़े गर्व से कहते हैं बिटिया ने मुझे गलत साबित कर दिया। अब मैं फख्र से कहता हूं कि मैं सोनिया का पिता हूं। 2017 की राष्ट्रीय चैंपियन सोनिया का लक्ष्य अब ओलंपिक में पदक जीतना है।