फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पैसों के लिए लड़कों से भिड़ती थी दिव्या, गरीबी से एशियाड ब्रॉन्ज मेडल तक की कहानी कर देगी भावुक

Tue, 21 Aug 2018 07:55 PM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 7
दिव्या काकरण
भारत की पहलवान दिव्या काकरन ने मंगलवार को एशियाई खेल 2018 में फ्रीस्टाइल 68 किग्रा वर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देशवासियों को खुश कर दिया। दिव्या रेसलिंग की दुनिया में जाना-पहचाना नाम हैं। इससे पहले वह 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी हैं। हालांकि, उन्होंने यह मुकाम हासिल करने के लिए कड़ा संघर्ष किया है। दिव्या के बचपन से एशियाड गेम्स में मेडल जीतने के बीच की कहानी बेहद रोचक है। चलिए आपको बताते हैं:
विज्ञापन

2 of 7
दिव्या काकरण
दिव्या का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था। बचपन में पैसों के लिए दिव्या लड़कों से भिड़ती थीं। दिव्या ने एक इंटरव्यू के दौरान अपने बचपन का रोचक किस्सा बताया था। उन्होंने कहा, 'मुझे शुरू से ही कुश्ती का शौक था। बचपन में जब मेरे पिता मुझे अखाड़े लेकर गए तो वहां माइक पर घोषणा की गई कि दिव्या की भिड़ंत लड़के से होगी।' 
विज्ञापन

3 of 7
दिव्या काकरण
उन्होंने आगे कहा, 'इतने में एक आदमी ने घोषणा कर दी कि अगर दिव्या जीत गई तो उसे इनाम में 500 रुपए देंगे। मुझे तो बस 500 रुपए का लालच था क्योंकि कभी मैंने अपने हाथ में इतने रुपए नहीं रखे थे। मैंने लड़के को हरा दिया और यही से मेरा करियर इस दिशा में आगे बढ़ने लगा।'

4 of 7
दिव्या काकरण
दिव्या के पिता भी कह चुके हैं कि घर में जब तंगहाली होती थी तो वह दिव्या को लेकर दंगल में चले जाते थे क्योंकि लड़की को देख लोग ज्यादा रकम देने को तैयार होते थे। उनकी बेटी जीत भी दर्ज करती थी, जिसकी वजह से एक बार में ही मोटी रकम घर आती थी। 
विज्ञापन

5 of 7
दिव्या काकरान
दिव्या के पिता ने यह भी बताया कि वह दंगल जाकर लंगोट बेचा करते थे, लेकिन इससे अच्छे से परिवार का गुजारा नहीं होता था। दिव्या मजबूत पहलवान थी, लेकिन उसकी देखभाल के लिए पिता दूध की जगह कभी ग्लूकोस भी पिला दिया करते थे। इसके बावजूद नन्हीं दिव्या ऊर्जा से भर जाती थी। 
विज्ञापन

6 of 7
दिव्या काकरण
दिव्या को सफल रेसलर बनाने के लिए उनके परिवार ने बड़ा समझौता किया है। युवा रेसलर के घर में दो भाई भी हैं और इनमें से एक की कुश्ती में काफी रूचि भी थी। मगर घर की परिस्थितियां यह कहती रही कि दिव्या और उसके भाई में से किसी एक का ही खर्च उठाया जा सकेगा। भाई ने अपना सपना छोड़ दिव्या को कुश्ती में बढ़ाने का फैसला किया और आज वह उनकी उपलब्धियों को देख खुश है।
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
दिव्या काकरण
पुर्बलियां गांव में जन्मी दिव्या का सपना है कि वह एक दिन ओलंपियन बने और देश के लिए मेडल जीते। 20 साल की दिव्या कहती हैं, 'मैंने बहुत मेहनत की है और हमेशा करती रहूंगी। मेरा सपना है कि ओलंपिक में मेडल जीतकर परिवार और देश का नाम रोशन करूं।' भारत की इस युवा महिला पहलवान पर देश को गर्व है और हम भी चाहेंगे कि दिव्या के ओलंपिक में मेडल जीतने का सपना पूरा हो।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें