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Explainer: हर फुटबॉल विश्वकप में नई गेंद क्यों, कैसे तय होते हैं इनके नाम? 96 साल में 23 गेंदें इस्तेमाल हुईं

Fri, 10 Jul 2026 02:16 PM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

1930 के पहले फीफा विश्व कप से लेकर 2026 तक टूर्नामेंट में 23 आधिकारिक मैच गेंदों का इस्तेमाल किया जा चुका है। हर विश्व कप के साथ नई गेंद इसलिए लॉन्च की जाती है ताकि नई तकनीक, बेहतर प्रदर्शन और मेजबान देश की संस्कृति को दुनिया के सामने पेश किया जा सके। जानिए टी-मॉडल से त्रियोंडा तक का पूरा सफर और इन गेंदों के नाम कैसे तय होते हैं।
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फीफा विश्वकप में इस्तेमाल हुई गेंदें - फोटो : FIFA.COM
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फुटबॉल विश्व कप सिर्फ खिलाड़ियों और ट्रॉफी की वजह से यादगार नहीं बनता, बल्कि हर टूर्नामेंट की आधिकारिक मैच गेंद भी उसकी पहचान बन जाती है। टेलस्टार, टैंगो, एजटेका, जाबुलानी, ब्रजुका और अब त्रियोंडा जैसे नाम फुटबॉल इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। 1930 में जब पहला फीफा विश्व कप खेला गया था, तब चमड़े की हाथ से सिली गेंद का इस्तेमाल होता था। आज 2026 में गेंद के अंदर एयरोडायनामिक डिजाइन, विशेष सतह, आधुनिक पैनल और हाई-परफॉर्मेंस तकनीक मौजूद है।
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फीफा विश्वकप 2026 - फोटो : FIFA.COM
1930 में एक ही फाइनल में दो अलग-अलग गेंदों से खेला गया मैच
उरुग्वे में खेले गए पहले विश्व कप के फाइनल में एक दिलचस्प घटना हुई। मेजबान उरुग्वे टी-मॉडल गेंद से खेलना चाहता था, जबकि अर्जेंटीना ने टिएंटो गेंद की मांग की। विवाद बढ़ने पर फैसला हुआ कि पहला हाफ अर्जेंटीना की गेंद और दूसरा हाफ उरुग्वे की गेंद से खेला जाएगा। पहले हाफ में अर्जेंटीना 2-1 से आगे था, लेकिन दूसरे हाफ में उरुग्वे ने वापसी करते हुए 4-2 से मैच जीत लिया।

हर फुटबॉल विश्व कप में नई गेंद क्यों आती है?
फीफा विश्व कप के लगभग हर संस्करण में नई आधिकारिक मैच बॉल पेश की जाती है। इसके पीछे कई अहम कारण होते हैं। 
 
  • पहला कारण तकनीक है। हर नए विश्वकप में गेंद को पहले से अधिक हल्का, संतुलित, तेज और मौसम के अनुकूल बनाया जाता है, ताकि खिलाड़ियों को बेहतर नियंत्रण और अधिक सटीक पास और शॉट लगाने में मदद मिले।
  • दूसरा कारण मेजबान देश की संस्कृति और पहचान को दुनिया के सामने पेश करना है। गेंद का नाम, रंग और डिजाइन अक्सर मेजबान देश के इतिहास, भाषा, परंपरा या किसी सांस्कृतिक प्रतीक से प्रेरित होता है। 
  • तीसरा कारण खेल में नवाचार लाना है। आधुनिक गेंदों में एयरोडायनामिक डिजाइन, वाटरप्रूफ मैटेरियल, थर्मल बॉन्डिंग और हाल के वर्षों में कनेक्टेड बॉल टेक्नोलॉजी जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। 

इस तरह हर नई गेंद विश्व कप की अपनी अलग पहचान भी बन जाती है। 
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फीफा विश्व कप - फोटो : Instagram
हर विश्व कप के साथ बदलती गई गेंद
 
  • 1930 से 1966 तक गेंदें मुख्य रूप से चमड़े की बनती थीं। इनमें पानी भर जाने से उनका वजन बढ़ जाता था और बारिश में खिलाड़ियों को काफी परेशानी होती थी।
  • 1950 में पहली बार सुपरबॉल डुप्लो टी बिना लेस वाली गेंद बनी। इससे गेंद का आकार ज्यादा गोल और संतुलित हुआ।
  • 1970 में बड़ा बदलाव आया, जब एडिडास पहली बार फीफा का आधिकारिक बॉल सप्लायर बना। उसी विश्व कप में टेलस्टार आई, जिसकी काले-सफेद डिजाइन पूरी दुनिया में फुटबॉल की पहचान बन गई।
  • इसके बाद टैंगो, एजटेका, एट्रूस्को, क्वेस्ट्रा, ट्रायकलर, फीवरनोवा, टीमगेइस्ट, जाबुलानीस, ब्रजुका, टेलस्टार18, अल रिहला और अब त्रियोंडा जैसी गेंदों ने तकनीक के नए मानक स्थापित किए।

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फीफा विश्वकप 2026 - फोटो : FIFA.COM
गेंदों के नाम कैसे तय होते हैं?
विश्व कप की आधिकारिक गेंद का नाम एडिडास और मिलकर तय करते हैं। आमतौर पर नाम मेजबान देश की संस्कृति, इतिहास, भाषा या किसी खास प्रतीक से प्रेरित होता है। कुछ उदाहरण-
 
  • टेलस्टार का नाम उस संचार उपग्रह पर रखा गया, जिसने पहली बार दुनिया भर में लाइव टीवी प्रसारण संभव बनाया।
  • टैंगो का नाम अर्जेंटीना के प्रसिद्ध नृत्य पर रखा गया।
  • एजटेका का नाम मेक्सिको की प्राचीन एज़टेक सभ्यता से लिया गया।
  • एट्रूस्को यूनिको इटली की एट्रस्कन सभ्यता से प्रेरित था।
  • जाबुलानी जुलू भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'जश्न मनाना'।
  • ब्रजुका ब्राजीलियाई लोगों की जीवनशैली और राष्ट्रीय गर्व को दर्शाता है।
  • अल रिहला अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'यात्रा' होता है।
  • त्रियोंडा स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ 'तीन लहरें' है। यह अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको- तीनों मेजबान देशों का प्रतीक है।

कई बार नाम चुनने में फैंस की भी भागीदारी होती है। उदाहरण के लिए ब्रजुका का नाम लाखों प्रशंसकों की वोटिंग के बाद चुना गया था।
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त्रियोंडा - फोटो : FIFA INSTAGRAM
त्रियोंडा क्यों सबसे एडवांस?
2026 विश्व कप के लिए बनाई गई त्रियोंडा अब तक की सबसे आधुनिक मैच गेंदों में शामिल है। इसमें पहली बार चार बड़े पैनल वाला डिजाइन दिया गया है। गहरी सीम गेंद को हवा में अधिक स्थिर बनाती हैं। इसकी सतह पर बने उभरे हुए पैटर्न बारिश और नमी में भी खिलाड़ियों को बेहतर ग्रिप देते हैं। गेंद पर कनाडा का मेपल लीफ, मेक्सिको का ईगल और अमेरिका का स्टार बनाया गया है, जबकि सुनहरे रंग की सजावट विश्व कप ट्रॉफी का प्रतीक है।

सेमीफाइनल और फाइनल के लिए अलग गेंद
फीफा ने छह जुलाई 2026 को त्रियोंडा फाइनल भी लॉन्च की। यह सेमीफाइनल, तीसरे स्थान के मुकाबले और फाइनल में इस्तेमाल की जाएगी। पहली बार सिर्फ रंग बदलने के बजाय नॉकआउट मुकाबलों के लिए अलग डिजाइन तैयार किया गया है, ताकि टूर्नामेंट के सबसे बड़े मैचों को खास पहचान मिल सके। आइए अब 1930 से लेकर 2026 तक इस्तेमाल की गई गेंदों के बारे में एक-एक करके जानते हैं...
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टी मॉडल - फोटो : FIFA.COM
1930: टी मॉडल
पहले फीफा विश्व कप में टी मॉडल का इस्तेमाल हुआ। यह हाथ से सिली गई चमड़े की गेंद थी, जिसमें 11 टी-आकार की पट्टियां थीं। खास बात यह रही कि 1930 के फाइनल में पहले हाफ में अर्जेंटीना की पसंदीदा टिएंटो और दूसरे हाफ में टी मॉडल से खेला गया था।
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फेडेरल - फोटो : FIFA.COM
1934: फेडेरल 102
इटली में आयोजित विश्व कप में फेडेरल 102 आधिकारिक गेंद थी। इसमें 13 चमड़े के पैनल थे और पहली बार लेदर की बजाय कॉटन धागों से सिलाई की गई, जिससे खिलाड़ियों को हेडर लगाने में आसानी हुई।

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एलेन - फोटो : FIFA.COM
1938: एलेन
फ्रांस विश्व कप की एलेन गेंद बिना किसी ब्रांडिंग के मैदान में उतारी गई। यह भी 13 पैनल वाली चमड़े की गेंद थी और 1924 पेरिस ओलंपिक में भी इसी डिजाइन का इस्तेमाल किया गया था।

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सुपरबॉल डुप्लो टी - फोटो : FIFA.COM
1950: सुपरबॉल डुप्लो टी
यह विश्व कप इतिहास की पहली बिना लेस की गेंद थी। वाल्व के जरिए इसमें हवा भरी जाती थी, जिससे इसका आकार ज्यादा गोल और संतुलित रहता था।

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स्विस वर्ल्ड चैंपियन - फोटो : FIFA.COM
1954: स्विस वर्ल्ड चैंपियन
हल्के पीले रंग की यह गेंद बारिश और धुंध में आसानी से दिखाई देती थी। हालांकि यह चमड़े की बनी थी, इसलिए पानी सोखकर भारी हो जाती थी।

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टॉप स्टार - फोटो : FIFA.COM
1958: टॉप स्टार
फीफा ने पहली बार प्रतियोगिता कराकर आधिकारिक गेंद चुनी। टॉप स्टार 102 गेंदों में विजेता बनी। इसी गेंद से ब्राजील ने पेले की अगुआई में पहला विश्व कप जीता।

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एमआर क्रैक - फोटो : FIFA.COM
1962: एमआर क्रैक
इस गेंद में पहली बार लेटेक्स वाल्व लगाया गया, जिससे हवा कम निकलती थी और गेंद लंबे समय तक अपने आकार में रहती थी।

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चैलेंज 4 स्टार - फोटो : FIFA.COM
1966: चैलेंज 4 स्टार
इंग्लैंड की कंपनी स्लेजेंजर द्वारा बनाई गई यह गेंद सफेद, पीले और नारंगी रंग में उपलब्ध थी। विश्व कप फाइनल में इस्तेमाल हुई नारंगी गेंद आज भी यादगार मानी जाती है।

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टेलस्टार - फोटो : FIFA.COM
1970: टेलस्टार
एडिडास पहली बार फीफा की आधिकारिक बॉल सप्लायर बनी। टेलस्टार की काले-सफेद डिजाइन टीवी प्रसारण के लिए बनाई गई थी और बाद में फुटबॉल की वैश्विक पहचान बन गई।

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टेलस्टार डुरलास्ट - फोटो : FIFA.COM
1974: टेलस्टार डुरलास्ट
इसमें डुरलास्ट कोटिंग जोड़ी गई, जिससे गेंद पानी और कीचड़ से कम प्रभावित होती थी। पहली बार गेंद पर आधिकारिक ब्रांडिंग भी दिखाई गई।

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टैंगो डुरलास्ट - फोटो : FIFA.COM
1978: टैंगो डुरलास्ट
अर्जेंटीना के मशहूर टैंगो डांस से प्रेरित इस गेंद का डिजाइन इतना लोकप्रिय हुआ कि अगले पांच विश्व कप तक इसी पैटर्न का इस्तेमाल किया गया।

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टैंगो एस्पाना - फोटो : FIFA.COM
1982: टैंगो एस्पाना
इस गेंद में पॉलीयूरेथेन कोटिंग दी गई, जिससे यह पहले की तुलना में ज्यादा टिकाऊ और वाटरप्रूफ बनी।

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एजटेका - फोटो : FIFA.COM
1986: एजटेका
विश्व कप इतिहास की पहली पूरी तरह सिंथेटिक गेंद। इसका नाम मेक्सिको की प्राचीन एज़टेक सभ्यता पर रखा गया।

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एट्रूस्को यूनिको - फोटो : FIFA.COM
1990: एट्रूस्को यूनिको
इटली की प्राचीन एट्रस्कन सभ्यता से प्रेरित इस गेंद पर तीन शेरों के सिर बने थे। बाद में यूरो और ओलंपिक में भी इसका इस्तेमाल हुआ।

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क्वेस्ट्रा - फोटो : FIFA.COM
1994: क्वेस्ट्रा
अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रम से प्रेरित इस गेंद पर ग्रह, तारे और रॉकेट बने थे। यह पहले से ज्यादा हल्की और तेज थी।

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ट्रायकलर - फोटो : FIFA.COM
1998: ट्रायकलर
फ्रांस के राष्ट्रीय ध्वज के रंगों पर आधारित यह विश्व कप की पहली मल्टीकलर गेंद थी। इसमें नई सिंटैक्टिक फोम तकनीक का इस्तेमाल हुआ।

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फीवरनोवा - फोटो : FIFA.COM
2002: फीवरनोवा
छह विश्व कप बाद पहली बार गेंद का डिजाइन पूरी तरह बदला गया। इसका नाम फीवर और सुपरनोवा शब्दों को मिलाकर रखा गया।

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टीमगेइस्ट - फोटो : FIFA.COM
2006: टीमगेइस्ट
जर्मन भाषा में टीमगेइस्ट का अर्थ 'टीम भावना' है। इसमें केवल 14 पैनल थे और इन्हें सिलने के बजाय थर्मल बॉन्डिंग तकनीक से जोड़ा गया।

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जाबुलानी - फोटो : FIFA.COM
2010: जाबुलानी
जुलू भाषा में जाबुलानी का मतलब 'जश्न मनाना' होता है। इसकी उड़ान को लेकर गोलकीपरों ने काफी शिकायतें की थीं, लेकिन यह विश्व कप की सबसे चर्चित गेंदों में रही।

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ब्रजुका - फोटो : FIFA.COM
2014: ब्रजुका
इस गेंद का नाम ब्राजील के लोगों ने ऑनलाइन वोटिंग के जरिए चुना था। इसकी सतह और एयरोडायनामिक्स को पहले की तुलना में काफी बेहतर बनाया गया।

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टेलस्टार 18 - फोटो : FIFA.COM
2018: टेलस्टार 18
1970 की टेलस्टार को आधुनिक रूप में पेश किया गया। पहली बार गेंद में एनएफसी चिप लगाई गई, जिससे स्मार्टफोन के जरिए उससे जुड़ा जा सकता था।

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अल रिहला - फोटो : FIFA.COM
2022: अल रिहला
अल रिहला का अर्थ 'यात्रा' है। इसमें कनेक्टेड बॉल टेक्नोलॉजी दी गई, जिसने ऑफसाइड फैसलों को ज्यादा सटीक बनाने में मदद की। सेमीफाइनल और फाइनल में अल हिल्म (सपना) गेंद का इस्तेमाल हुआ।

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त्रियोंडा - फोटो : FIFA.COM
2026: त्रियोंडा / त्रियोंडा फाइनल
त्रियोंडा का मतलब 'तीन लहरें' है, जो अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको- तीनों मेजबान देशों का प्रतीक है। इसमें नया चार-पैनल डिजाइन, गहरी सीम और बेहतर एयरोडायनामिक्स दिए गए हैं। सेमीफाइनल और फाइनल के लिए त्रियोंडा फाइनल का विशेष संस्करण लॉन्च किया गया, जो विश्व कप इतिहास में पहली बार नॉकआउट चरण के लिए अलग डिजाइन वाली गेंद है।

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त्रियोंडा फाइनल - फोटो : FIFA.COM
1930 की साधारण चमड़े की गेंद से लेकर 2026 की त्रियोंडा तक विश्व कप की गेंदों का सफर फुटबॉल तकनीक के विकास की कहानी भी है। कभी खिलाड़ियों की सबसे बड़ी चुनौती बारिश में भारी हो जाने वाली गेंद थी, तो आज एयरोडायनामिक्स, ग्रिप, उड़ान की स्थिरता और हाई-परफॉर्मेंस इंजीनियरिंग पर काम हो रहा है। यही वजह है कि विश्व कप की हर नई गेंद सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि अपने दौर की तकनीक, संस्कृति और मेजबान देश की पहचान का प्रतीक बन जाती है।
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