संसार सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का मनुष्य का दावा अब झूठा। इस दावे को चुनौती दी है तो वह भी मच्छरों ने। पिछले पच्चीस साल से भी ज्यादा तक लड़ने के बाद अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी मान लिया है कि मलेरिया उन्मूलन अभियान संदिग्ध है।
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इस तरह मच्छरों को इंसान का पता लग जाता है और फिर होता है हमला
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मलेरिया तो अपनी जगह कायम ही है। इस बीच जो मच्छरों के कारण फिलेरिया, डेंगू, फिलपाँव और मस्तिष्क शोथ और पीला बुखार अलग सिर उठाने लगे हैं। इन तकलीफों के रोगाणु मच्छरों द्वारा ही मनुष्य शरीर में प्रवेश पाते हैं। देखा जाय तो मनुष्य की तुलना में मच्छर का अस्तित्व नगण्य ही है।
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इस तरह मच्छरों को इंसान का पता लग जाता है और फिर होता है हमला
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मुश्किल से एक मिलीमीटर लम्बाई का उसका शरीर और उसका जीवन मात्र तीस दिन। रोग के कारण और रोगाणुओं के जीवनचक्र का अध्ययन कर लेने के बाद उसके उपचार की भी खोज हुई और कुनैन इसकी अचूक औषधि सिद्ध हुई। कुनैन कुछ समय तक तो कारगर होती रही। उसके बाद आज तक वायरल बुखारों की कोई कारगर औषधि नहीं खोजी जा सकी है। मच्छर प्रायः अन्धेरे स्थानों या रुके हुए पानी के गड्ढों पर अण्डे देता है। उन्हें खत्म करने के लिए डीडीटी की शोध हुई।
इस तरह मच्छरों को इंसान का पता लग जाता है और फिर होता है हमला
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कालान्तर मच्छरों की एक ऐसी नस्ल विकसित हुई जिस पर डीडीटी का कोई प्रभाव नहीं होता है। अन्य कीटनाशक दवाओं का निर्माण भी किया गया। मैलेथियान, मैथिलपैरेथियान, एथिलपैरेथियान, फैनथियान जैसी कीटनाशी दवाओं का उपयोग होने लगा, पर सबका परिणाम वही हुआ। मच्छर उन्हें खाकर मर तो जाते थे, पर बहुत से बचे भी रहते और उन बचे हुए मच्छरों की जो सन्तानें होतीं वे फिर कीटनाशी दवाओं के प्रभाव से मुक्त ही रहती। उनमें इन कीटनाशक दवाओं की प्रतिरोधी शक्ति का जन्म हो गया।
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जब यह उपाय असफल होने लगे रुके हुए पानी को तेजी से बहाने, अन्धेरे स्थानों पर सफाई करने के प्रयोग किए गए। पर मच्छरों ने भी जैसे हार न मानने की कसम खा रखी है। पाया गया कि मच्छरों ने गन्दे पानी में अण्डे देने की अपनी आदत को बदल लिया है और वे साफ पानी पर भी अण्डे देने लगी हैं। क्यूलेक्स तथा स्टिकेन्सी जाति के मच्छर तो बहते हुए पानी पर भी अण्डे देते देखे गए हैं।
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यह सोचा गया कि मच्छरों के आक्रमण की सम्भावना वाली जगहों पर रहना छोड़ दिया जाए। लेकिन मच्छरों ने तुरंत अपनी आदतें बदली और वे दूर रहने वालों को भी शिकार बनाने लगे। पता चला कि मच्छरों को दूर से मनुष्य के होने की खबर मिल जाती है। सांसों से निकलने वाली गैस पसीने से निकलने वाली ‘एक्रीन’ और ‘एपोक्रीन’ गन्ध मच्छर को आदमी के होने का पता दे देती है। इतनी मोर्चाबन्दी के बावजूद मच्छर जैसे नगण्य कीड़े को काबू में न ला सकने पर भी मनुष्य किस अहंकार में अकड़ा घूमता है।
ज्योतिर्मय