अगर आप क्रोध, खीझ या उतावली में भोजन करते हैं, तो उसका प्रभाव नकारात्मक होता है। कितना ही पौष्टिक और विटामिन्स से युक्त भोजन किया जाए, उससे पर्याप्त पोषण नहीं मिलता। समस्या यह है कि दैनिक जीवन की परेशानियों और उलझनों का निराकरण किए बिना, स्वस्थ चित्त से भोजन कैसे किया जाए?
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इसका उपाय यह बताया गया है कि भोजन के लिए आधे घंटे पहले से मन की स्थिति शिथिल कर लें। समाधान बताते हुए गीता स्वाध्याय मंडल (पुणे) के पुनीत सरवटे का कहना है कि भोजन को प्रसाद बना लेने पर चित्त की उद्विग्नता सत्तर प्रतिशत तक कम हो जाती है। परिवारों में भोजन के पूर्व भगवान को भोग लगाने की परंपरा है।
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शास्त्रों में उसके लिए बाकायदा विधि-विधान तय है। उसके अनुसार, जमीन पर आसन बिछाकर और पालथी से बैठकर ही भोजन करना चाहिए। पूजा-पाठ या ध्यान आदि करते समय जो सावधानियां अपनाई जाती हैं।
भोजन के समय भी वही सब अपनाई जाए, तो भोजन में पौष्टिकता के लिहाज से भले ही थोड़ी कमी हो, पर वह संपूर्ण आहार से ज्यादा पोषक सिद्ध होता है। शास्त्रों में इस बात को धान-दोष (अन्न का कुप्रभाव) दूर करने के लिहाज से भी जरूरी बताया गया है। भाव शुद्धि के लिए भी यह जरूरी है।