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देखा-देखी भी सध जाए योग, यह कोई क्रिया नहीं, बल्कि साधना है

Fri, 13 Mar 2020 05:31 PM IST
योगेश जोशी तारिणी मोदी
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दिसंबर 2014 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को योग दिवस मनाने की संस्तुति की। विश्व स्तर पर स्वीकार किया गया कि योग अध्यात्म परंपरा का खास भाग है। यह कोई क्रिया नहीं, बल्कि साधना है, जिसमें शरीर, मन और आत्मा तीनों एक हो जाते हैं। गीता में कहा गया है कि कर्मों में कुशलता योग से आती है।
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एक ऐसे महायोगी भी हाल तक हमारे बीच रहे हैं, जिन्होंने योग से न केवल अपने समय के असाध्य समझे जाने वाले क्षय रोग यानी टीबी पर विजय प्राप्त की, अपितु वे 96 वर्ष तक जिए और आधिनुक योग के जनक भी कहलाए। वेल्लूर कृष्णमचार सुंदरराजा आयंगर के (संक्षेप में आयंगर) नाम से विश्व को भारतीय योग से परिचित कराने वाले योगी को ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्मविभूषण’ से सम्मानित भी किया गया था।
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14 दिसंबर, 1918 को मैसूर (अब कर्नाटक) में कोलार के वेल्लूर में जन्मे वी.के.एस. आयंगर को शुरू से ही मलेरिया, टायफॉइड और क्षय (टीबी) जैसे गंभीर रोगों की तकलीफ थी। इन्हीं बीमारियों के साथ उन्होंने जीवन के 16 वर्ष बिताए। सारे उपचार विफल होने के बाद 1934 में वे कृष्णमाचार्य नामक योगगुरु के पास गए और उनके पास रहकर योग सीखने लगे।

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योग साधना से आयंगर के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा और बीमारियां मिटने लगीं। शुरू में गुरु ने उन्हें उपेक्षित किया। आयंगर ने कठोर आसन आरंभ किए और सफल योग साधक के रूप में उभरे। आसनों के जरिए तनाव को राहत देने के लिए योग एक शक्तिशाली उपकरण माना जाता है। आयंगर योग में 200 योगासन और 14 प्राणायाम हैं।
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आयंगर योग तीन प्रमुख तत्वों द्वारा योग की अन्य शैलियों से अलग है- तकनीक, क्रम और समय। उन्होंने ‘योगा प्रैक्टिसेस’, ‘फिलॉसफी लाइट ऑन योग’, ‘लाइट ऑन प्राणायाम’, ‘लाइट ऑन द योग सूत्र ऑफ पतंजलि’, ‘लाइट ऑफ लाइफ’ आदि पुस्तकों के रूप में एक विरासत दी है। दूसरे आसनों की तुलना में इन आसनों को देर तक करने पर ही शरीर को पूरी तरह से लाभ मिल सकता है।
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