अक्सर हम लोग ईश्वर से अपनी सुख सुविधाओं की चीजें मांगते रहते हैं। किसी परेशानी से मुक्त होने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं। जब भी उनके सामने बैठते हैं, तो अपनी इच्छाओं की एक लंबी सूची भी उनके सामने रख देते हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब बिना किसी मतलब से उनकी चौखट पर जाएं, क्योंकि वो सब जानते हैं कि किसे कितना देना है। तभी तो कहते हैं बिन मांगे सब मिले...जैसे इस दर्जी के साथ हुआ।
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एक राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गांव-गांव घूम रहा था। घूमते समय उसके कुर्ते का एक बटन टूट कर गिर गया। उसने अपने मंत्री को गांव में एक दर्जी ढूंढने का आदेश दिया। बहुत ढूंढने के बाद एक दर्जी मिला। दर्जी को राजा के सामने ले जाया गया।
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राजा ने कहा कि क्या तुम मेरे कुर्ते का बटन सिल सकते हो? दर्जी ने कहा जी महाराज। यह तो बहुत ही आसान काम है। उसने बटन लेकर कुर्ते पर टांक दिया। राजा ने दर्जी से पूछा कि कितने पैसे हुए? उसने कहा कि महाराज इतना छोटा सा काम था। रहने दीजिए।
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राजा ने फिर से दर्जी से पूछा, बोलो कितने रुपये दूं? दर्जी ने मन में सोचा कि जब महाराज इतना पूछ ही रहे हैं, तो दो रुपए मांग लेता हूं। फिर उसने सोचा कि कहीं राजा यह न सोचें कि यह बटन टांकने के बदले में मुझसे दो रुपए ले रहा है, तो गांव वालों से कितना लेता होगा। उस जमाने में दो रुपए की कीमत बहुत होती थी। दर्जी ने कहा कि महाराज आपको जो ठीक लगे, उतना दे दीजिए।
राजा तो राजा होता है, उसे तो अपने ही हिसाब से देना था। उसने मंत्री से कहा कि इस दर्जी को दो गांव दे दो। यह हमारा हुक्म है। यह सुनकर दर्जी हैरान रह गया, क्योंकि वह तो सिर्फ दो रुपए की ही मांग कर रहा था और राजा ने तो उसे दो गांव दे दिए। कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम ईश्वर पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह अपने हिसाब से सबको देते हैं।