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विदुर नीतिः इन 6 नीतियों से जानिए कहीं आपका रिश्ता भी तो नहीं मतलब का

Wed, 13 Nov 2019 08:32 AM IST
योगेश जोशी धर्म डेस्क, अमर उजाला
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महाभारत
महाभारत के युद्ध के समाप्त होने के बाद जीवित बचे व्यक्तियों में से विदुर भी एक व्यक्ति थे। वह अपने ज्ञान और कौशल के कारण ही स्वयं को महाभारत के युद्ध से अलग रखने में सफल हुए थे। युद्ध समाप्ति के बाद वह युधिष्ठिर के महामंत्री नियुक्त हुए। विदुर की नीतियां शुक्राचार्य और आचार्य चाणक्य की तरह प्रसिद्ध मानी जाती हैं। वे समय-समय पर धृतराष्ट्र को अनेक उदाहरणों से सही राह दिखाने का प्रयास करते थे। एक श्लोक द्वारा विदुर कुछ लोगों की स्थितियों का जिक्र करते हुए धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि मनुष्य का व्यवहार कब कैसा होना चाहिए।
 
षडेते ह्यमन्यते नित्यं पूर्वोपकारिणाम।।
आचार्य शिक्षिताः शिष्याः कृतदारश्र्च मातरम् ।।
नावं निस्तीर्णकान्तारा आतुराश्र्च चिकित्सकम्।।


 
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gurukul - फोटो : सोशल मीडिया
गुरु का अपमान
विदुरजी ने कहा है कि शिक्षा गृहण करने के बाद शिष्य गुरु का अपमान करता है। जब तक उसे अपने गुरु से शिक्षा से मिलती है, तब तक वह उनका सम्मान करता है। जब उसे लगता है कि अब गुरु के पास देने को कुछ नहीं है तो वह उसी गुरु का अपमान करते हैं जिससे उन्होंने सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया है। शिक्षा गृहण करने के बाद कौरवों ने अनेक बार गुरु द्रोणाचार्य का अपमान किया, यह इसका उदाहरण है।
 
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mother
ईश्वर से बड़ा मां का दर्जा
विदुरजी के अनुसार मां का स्थान मनुष्य के जीवन में ईश्वर से भी ऊंचा है। मां हर समय बच्चों के साथ होती है व उसकी रक्षा करती है। भगवान हर समय बच्चों के साथ नहीं रहता है। भगवान ने इस कमी को पूरा करने के लिए मां को बनाया है। मां अपने बच्चे की हर जिद को पूरा करती है व उसके लिए बड़े से बड़े खतरे को स्वयं ही सह लेती है। बच्चे का विवाह हो जाने के बाद वह पत्नी को ज्यादा तवज्जो देता है और मां का उसके जीवन में प्रभाव कम हो जाता है। विवाह के बाद मां के सम्मान में भी कमी आ जाती है।

 

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selfish
मतलबी लोगों की पहचान
अगर किसी व्यक्ति का कोई कार्य फंसा है और कोई उसकी सहायता कर रहा है तो वह काम पूरा हो जाने तक उसके आगे पीछे लगा रहेगा। काम पूरा हो जाने के बाद वह उस इंसान को भूल जाता है। कहीं मुलाकात हुई भी तो ऐसे व्यवहार करेगा जैसे उसे जानता ही नहीं है।  ऐसे लोग मतलबी होते हैं । वह सिर्फ अपने काम के लिए लोगों को याद करते हैं।

 
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उमंगोट नदी - फोटो : Social media
नाविक का साथ नदी तक ही 
नदी में बहती लहरों को पार करने के बाद भी व्यक्ति नाव का साथ छोड़ देता है। नदी पार करने के बाद वह उसे घाट पर ही छोड़कर चला जाता है। नाव नदी पार करने में उसका साथ देती है। फिर भी उसका साथ नदी तक ही सीमित है। इसीलिए नाव और नाविक यात्री से संबंध नहीं जोड़ते हैं।

 
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ayurveda - फोटो : amarujala
चिकित्सक से भी बीमारी तक रिश्ता
रोगी पुरुष बीमारी तक ही डॉक्टर की सलाह को मानते हैं। रोग सही हो जाने के बाद वह डॉक्टर को धन्यवाद भी नहीं कहते हैं। बीमारी तक वह समय पर ही डॉक्टर के पास पहुंचेंगे और उसकी हर बातों का सम्मान करेंगे। सही हो जाने पर डॉक्टर की सही बातें भी उसे खराब लगने लगती हैं।
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