प्रेम में आजादी, मोह में अधिकार की भावना
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प्रेम में आजादी, मोह में अधिकार की भावना
सच्चा प्रेम किसी व्यक्ति को अपनी इच्छाओं के अनुसार बदलने की कोशिश नहीं करता। इसमें सामने वाले की पसंद, भावनाओं और स्वतंत्रता का सम्मान होता है। इसके विपरीत मोह में यह भावना मजबूत होने लगती है कि दूसरा व्यक्ति हमेशा हमारे मुताबिक व्यवहार करे।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 47वां श्लोक)
अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म करने पर है, उसके परिणाम पर नहीं। रिश्तों में भी इस सीख को समझा जा सकता है। प्रेम करें, अपना व्यवहार सच्चा रखें, लेकिन सामने वाला उसी तरह प्रतिक्रिया दे, इसकी जिद न करें।