आचार्य चाणक्य
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जिस धन के लिए करनी पड़े शत्रु की चापलूसी
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मुझे वह दौलत नहीं चाहिए जिसके कारण मुझे शत्रु की चापलूसी करनी पड़े। जो धन शत्रु की चापलूसी करके प्राप्त हो उसके कारण सदैव अपमानित होना पड़ता हैैैै। इसके साथ ही व्यक्ति स्वयं भी भीतर ही भीतर आत्मग्लानि महसूस करता हैै, इसलिए ऐसे धन का त्याग करना ही उचित है।