Chanakya Success Mantra
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त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
तमर्शवन्तं पुनराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुषस्य बन्धु:।।
चाणक्य नीति के इस श्लोक का अर्थ है कि जब व्यक्ति के पास धन नहीं रहता है तो उसे मित्र, स्त्री, पुत्र, भाई-बंधु, नौकर चाकर सभी छोड़कर चले जाते हैं। वहीं यदि उसके पास फिर से धन संपत्ति आ जाए तो वे सभी पुनः उसके साथ खड़े दिखाई देते हैं। संसार में धन ही मनुष्य का बंधु है। आचार्य चाणक्य ने धन के व्यावहारिक पक्ष को बताते हुए कहा है कि इसी के इर्द-गिर्द सारे संबंधों का ताना-बाना है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं।