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चाणक्य नीति: जानिए किन परिस्थितियों में अकेला पड़ जाता है मनुष्य, अपने भी छोड़ देते हैं साथ

Thu, 04 Mar 2021 06:51 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Chanakya Success Mantra - फोटो : social media
आचार्य चाणक्य एक महान विद्वान थे। उन्होंने चाणक्य नीति शास्त्र में अपने अनुभवों और विचारों को नीतियों के रूप में संकलित किया है। यदि मनुष्य चाणक्य नीतियों का पालन अपने वास्तविक जीवन पर कर ले तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है। इसमें न केवल व्यक्ति बल्कि समाज कल्याण के लिए बहुमूल्य बातें हैं। चाणक्य नीति के एक श्लोक में आचार्य चाणक्य ने ऐसी स्थिति का वर्णन किया है कि एक ऐसी परिस्थिति सामने आ जाती है जहां मनुष्य अकेला पड़ जाता है, अपने भी उसका साथ छोड़कर चले जाते हैं। यह श्लोक इस प्रकार है -   
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Chanakya Success Mantra - फोटो : social media
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च। 
तमर्शवन्तं पुनराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुषस्य बन्धु:।।
चाणक्य नीति के इस श्लोक का अर्थ है कि जब व्यक्ति के पास धन नहीं रहता है तो उसे मित्र, स्त्री, पुत्र, भाई-बंधु, नौकर चाकर सभी छोड़कर चले जाते हैं। वहीं यदि उसके पास फिर से धन संपत्ति आ जाए तो वे सभी पुनः उसके साथ खड़े दिखाई देते हैं। संसार में धन ही मनुष्य का बंधु है। आचार्य चाणक्य ने धन के व्यावहारिक पक्ष को बताते हुए कहा है कि इसी के इर्द-गिर्द सारे संबंधों का ताना-बाना है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
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Chanakya Success Mantra - फोटो : social media
अन्यायोपार्जितं वित्तं दशवर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति।।
अर्थात अन्याय से कमाया हुआ धन अधिक से अधिक 10 वर्ष तक आदमी के पास टिकता है और 11वें वर्ष के शुरू होते ही ब्याज और मूल सहित नष्ट हो जाता है। यानी मनुष्य को गभी गलत और अन्याय के रास्ते से धन नहीं कमाना चाहिए। बल्कि अपने पुरुषार्थ से धन कमाना चाहिए।

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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः । 
सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ।।
अर्थात सांप दुर्जन व्यक्ति से ज्यादा बेहतर है। क्योंकि सांप खुद पर खतरा महसूस होता है तभी डसता है लेकिन दुर्जन प्रवृति का मनुष्य हर समय डसने के लिए मौका तलाशता है। चाणक्य के अनुसार दुर्जन मनुष्य आपका कभी भला नहीं कर सकता है। 
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
प्रलये भिन्नमार्यादा भविंत किल सागर:
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलेयशपि न साधव:।
अर्थात जब प्रलय आती है तो समुद्र भी अपनी सीमाओं को तोड़ देता है, लेकिन सज्जन व्यक्ति प्रलय के समान भयंकर आपत्ति एवं विपत्ति में भी अपनी सीमा नहीं लांघते हैं। सज्जन व्यक्ति धैर्यवान होते हैं। अपने संयम से ही वे सफल होते हैं। 
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