आचार्य चाणक्य
- फोटो : Social media
धूर्त दोस्त
आचार्य चाणक्य के अनुसार धूर्त दोस्त के साथ रहना सर्प के साथ रहने के समान हैं, क्योंकि धूर्त मित्र होने पर व्यक्ति संदेह की स्थिति से घिरा रहता है और वह अपनी मनोस्थिति किसी से नहीं कह पाता है और न ही कोई निर्णय ले पाता है। मित्र ही ऐसा व्यक्ति होता है, जिसे व्यक्ति के बारे में भेद भी पता होता है, इसलिए मित्र के धूर्त होने पर व्यक्ति का अहित हो सकता है।