सावन के महीने में चारों तरफ हरियाली रहती है और प्रकृति की सौंदर्यता बरकरार रहती है। शास्त्रों में महिलाओं को भी प्रकृति का रूप माना गया है। इस मौसम में चारों तरफ बारिश की बूंदों से हरियाली खिल उठती है। ऐसे में प्रकृति से एकाकार होने के लिए महिलाएं भी मेंहदी लगाती हैं। मेंहदी लगाने का प्रचलन सदियों से चला आ रहा है।
मेंहदी का उपयोग पूजा के दौरान भी किया जाता है। मेंहदी धार्मिक के साथ-साथ सेहत के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है। बारिश के मौसम में कई तरह की बीमारियां फैलती हैं और हरे रंग को आयुर्वेद में कई रोगों की रोक-थाम में कारगर माना गया है। मेंहदी की खुशबू और उसकी ठंडक तनाव को खत्म करती है। यही कारण है कि मेंहदी लगाने को काफी महत्वपूर्ण माना गया है।
मेंहदी की तासीर ठंडी होने के कारण इसका उपयोग शरीर में बढ़ी हुई गर्मी को कम करने के लिए किया जाता है। हाथों और पैरों के तलवों में मेंहदी लगाने से शरीर की गर्मी कम होती है। मेंहदी में कई औषधीय गुण मौजूद हैं। मेंहदी की शीतलता के कारण तनाव, सिरदर्द और बुखार से राहत मिलती है। मेंहदी का इस्तेमाल करने से कई त्वचा संबंधित बीमारियां खत्म हो जाती हैं।
सावन में कई तीज-त्योहार पड़ते हैं और महिलाओं के व्रत-उपवास और तरह-तरह के पूजा-पाठ शुरू हो जाते हैं। इस माह में पूजा-पाठ करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य प्राप्ति होती है और साथ ही घर में यश और वैभव बढ़ता है।
धर्मग्रंथों के मुताबिक महिलाओं को सौभाग्य प्राप्ति वाले तीज-त्योहार और व्रत के दौरान सोलह श्रृंगार करना जरूरी माना गया है। इसका मतलब यह है कि सौभाग्य प्राप्ति की चीजों को धारण करना जरूरी माना गया है।