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क्यों पूरी दुनिया के लिए खास बन गया था शिकागो में दिया विवेकानंद का वो ऐतिहासिक भाषण

Wed, 11 Sep 2019 04:39 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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swami vivekanand

12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में जन्में नरेंद्र नाथ आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से मशहूर हुए। विवेकानंद की जब भी बात होती है तो अमेरिका के शिकागो की धर्म संसद में साल 1893 में दिए गए भाषण की चर्चा ज़रूर होती है। ये वो भाषण है जिसने पूरी दुनिया के सामने भारत को एक मजबूत छवि के साथ पेश किया। लेकिन भाषण में उन्होंने कहा क्या यह कम ही लोग बता पाते हैं। ये हैं स्वामी विवेकानंद के उस भाषण की खास बातें-

 
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swami vivekanand
अमेरिका भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है, उससे मेरा दिल भर आया है। में दुनिया की सबसे पुरानी संत-परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं।
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Swami Vivekanand
में इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं, जिन्होंने यह ज़ाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है।

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स्वामी विवेकानंद की जयंती
मुझें गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।
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स्वामी विवेकानंद
मुझें गर्व है कि मैं उस देश से हूं, जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी। मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं, जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली।
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स्वामी विवेकानंद
मुझें गर्व है कि में एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है।
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Vivekanand

में इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं, जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं. ''जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं। ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है। ये रास्तें देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं।

 
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swami vivekanand
मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है। वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश का प्रमाण है। जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं।
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