शास्त्रों पुराणों में ग्रहण को बड़ा ही महत्व दिया गया है और कहा गया है कि इस समय व्यक्ति को न तो मल-मूल करना चाहिए और न भोजन एवं मैथुन। आखिर इसके पीछे क्या कारण है और ऐसा करने से क्या होता है आइये देखें।
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शास्त्रों में ग्रहण के समय मैथुन और भोजन की इसलिए मनाही है
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स्कन्द पुराण के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। देवी भागवत के अनुसार सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन होता है।
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ग्रहण के समय सोने से व्यक्ति रोगी होता है। इसलिए ग्रहण के समय भगवान का ध्यान करते हुए जागरण करना चाहिए।
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शास्त्रों के अनुसार ग्रहण के समय मल-मूत्र त्यागने से घर में दरिद्रता आती है। इसलिए ग्रहण के समय मल मूत्र के त्याग से बचना चाहिए। इसलिए ग्रहण से पहले ऐसा भोजन नहीं करें कि ग्रहण के दौरान मल मूल करना पड़े।
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शास्त्रों के अनुसार ग्रहण के समय मैथुन करने से व्यक्ति अगले जन्म में सूअर की योनि में जन्म लेता है।
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ग्रहण के समय किसी से धोखा या ठगी करने से अगले जन्म में सर्प की योनि मिलती है।
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जीव-जंतु या किसी की हत्या करने से कीड़े-मकड़ों जैसी नीच योनियों में भटकना पड़ता है।
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ग्रहण के समय भोजन अथवा मालिश करने से व्यक्ति अगले जन्म में कुष्ठ रोगी होता है।