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कौन थे देवरहा बाबा, जिनकी इंदिरा गांधी भी थीं भक्त, जानिए उनके बारे में कुछ दिलचस्प बातेंं

Fri, 06 Jul 2018 12:16 PM IST
कल्पवृक्ष, अमर उजाला
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देवरहा बाबा
देवरहा बाबा ने अपनी उम्र, तप और सिद्धियों के बारे में कभी कोई दावा नहीं किया। सहज, सरल और सादा जीवन जीने वाले बाबा देवरहा तो बिना पूछे ही सब कुछ जान लेते थे। यह उनकी साधना की शक्ति थी। ऋषि-मुनियों के देश भारत में ऐसे कई संत हुए हैं, जिन्हें दिव्य संत कहा जाता है। ऐसे ही एक दिव्य संत थे, देवरहा बाबा। सहज, सरल और शांत प्रवृति के बाबा को बहुत ज्ञान था। उनसे मिलने आने वालों में देश-दुनिया के बड़े-बड़े लोगों के नाम शामिल हैं।

जून 1987 की बात है। वृंदावन में यमुना किनारे मचान पर बैठे देवरहा बाबा लोगों से बातचीत कर रहे थे। उधर अफरातफरी मची हुई थी। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बाबा के दर्शन करने आना था। आला अफसरों ने हैलीपैड बनाने के लिए वहां लगे एक बबूल के पेड़ की डाल काटने के निर्देश दिए। पता लगते ही बाबा ने एक बड़े अफसर को बुलाया और पूछा कि पेड़ क्यों काटना चाहते हो? अफसर ने कहा, 'प्रधानमंत्री आ रहे हैं, इसलिए जरूरी है।' बाबा बोले, 'तुम यहां प्रधानमंत्री को लाओगे, प्रशंसा पाओगे, प्रधानमंत्री का नाम भी होगा। लेकिन दंड तो बेचारे पेड़ को भुगतना पड़ेगा! वह इस बारे में पूछेगा, तो क्या जवाब दूंगा? नही! यह पेड़ नहीं काटा जाएगा।'
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देवरहा बाबा
अफसरों ने अपनी मजबूरी बताई पर बाबा जरा भी राजी नहीं हुए। उनका कहना था कि 'यह पेड़ होगा तुम्हारी निगाह में, मेरा तो साथी है, पेड़ नहीं कट सकता।' बाबा ने तसल्ली दी और कहा कि घबराओ मत, प्रधानमंत्री का कार्यक्रम टल जाएगा। दो घंटे बाद ही प्रधानमंत्री कार्यालय से रेडियोग्राम आ गया कि प्रोग्राम स्थगित हो गया है।

बाबा की शरण में आने वाले लोग सोचते कि बाबा ने इतना सब कैसे जान लेते हैं। ध्यान, प्राणायाम, समाधि के क्षेत्र में तो वह सिद्ध थे ही। धर्माचार्य, पंडित, तत्वज्ञानी, वेदांती भी उनसे संवाद करते थे। उन्होंने बड़ी-बड़ी साधनाएं कीं। देवरहा बाबा का जन्म कब और कहां हुआ, किसी को पता नहीं। उनकी उम्र का भी किसी को अंदाज नहीं। 
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देवरहा बाबा
उत्तर प्रदेश में देवरिया जिले के रहने वाले होने से उनका नाम देवरहा पड़ा। कुछ मान्यताओं के अनुसार, वह दैवीय शक्तियों से संपन्न थे, इसलिए उन्हें भक्तों ने देवरहा बाबा कहा। आयु, योग, ध्यान और आशीर्वाद, वरदान देने की क्षमता के कारण लोग उन्हें सिद्ध संत कहते थे। उनके अनुयायियों का मानना है कि वह 250 से 500 वर्ष तक रहे। मंगलवार, संवत 2047 की योगिनी एकादशी तदनुसार, 19 जून सन 1990 के दिन अपना शरीर छोड़ने वाले देवरहा बाबा की चमत्कारी शक्ति को लेकर तरह-तरह की बातें कही-सुनी जाती हैं। 

कहा जाता है कि बाबा जल पर भी चलते थे, उन्हें प्लविनी सिद्धि प्राप्त थी। किसी भी गंतव्य पर पहुंचने के लिए उन्होंने कभी सवारी नहीं की। बाबा हर साल माघ मेले के समय प्रयाग आते थे। यमुना किनारे वृंदावन में वह आधा घंटा तक तक पानी में, बिना सांस लिए रह लेते थे। देवरहा बाबा ने अपनी उम्र, तप और सिद्धियों के बारे में कभी कोई दावा नहीं किया, लेकिन उनके इर्द-गिर्द हर तरह के लोगों की ऐसी भी भीड़ रही, जो उनमें चमत्कार तलाशती थी। 

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देवरहा बाबा
देश में आपातकाल के बाद चुनाव हुए, तो इंदिरा गांधी हार गईं। कहते हैं कि वह भी देवरहा बाबा से आशीर्वाद लेने गईं। बाबा ने उन्हें हाथ उठाकर पंजे से आशीर्वाद दिया। वहां से लौटने के बाद इंदिरा जी ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा ही तय किया। इसी चिह्न पर 1980 में इंदिरा जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया और वे देश की प्रधानमंत्री बनीं। बाबा मचान पर बैठे-बैठे ही श्रद्धालुओं को धन्य करते थे। कई लोगों का दावा था कि उनके होंठों तक आने से पहले ही बाबा उनके मन की बात जान लेते थे।
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देवरहा बाबा
सन 1911 में जॉर्ज पंचम भारत आए, तो देवरिया जिले के मइल गांव में बाबा के आश्रम पहुंचे। उन्होंने बाबा के साथ क्या बात की, यह उनके शिष्यों ने कभी भी जगजाहिर नहीं की। चार खंभों पर टिका मचान ही उनका महल था, जहां नीचे से ही लोग उनके दर्शन करते थे। मइल गांव में वह साल में आठ महीना बिताते थे। 

कुछ दिन बनारस के रामनगर में गंगा के बीच, माघ में प्रयाग, फागुन में मथुरा के मठ के अलावा वे कुछ समय हिमालय में भी रहते थे। फिर अचानक 11 जून 1990 को उन्होंने दर्शन देना बंद कर दिया। मचान पर बाबा सिद्धासन पर बैठे ही रहे। अगले दिन मंगलवार को योगिनी एकादशी थी। आकाश में काले बादल छा गए। तेज आंधी-तूफान आया। यमुना की लहरें उछलकर बाबा के मचान तक पहुंचने लगीं और शाम चार बजे बाबा का शरीर स्पंदनरहित हो गया।
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