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जानें भगवान श्रीराम ने क्यों कहा था 'भय बिनु होई न प्रीति'

Wed, 05 Aug 2020 06:35 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
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भगवान राम (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
भगवान श्रीराम का अयोध्या में भव्य मंदिर बनने जा रहा है। 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का भूमि पूजन होगा। हम सभी जानते हैं कि प्रभु श्रीराम का जीवन आदर्शवाद का सर्वोच्च उदाहरण हैं। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व मर्यादा में रहकर कर्तव्यों को प्राथमिकता देता है इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। एक बार प्रभु राम को समुद्र पर इतना क्रोध आ गया कि उसे सुखाने के लिए भगवान राम ने अग्नि बाण तक निकाल लिया था। इस संबंध में रोचक कथा कुछ इस प्रकार है- 
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टीवी सीरियल रामायण का एक दृश्य - फोटो : twitter
रामचरित मानस के द्वारा तुलसीदास ने प्रभु श्रीराम के जीवन से उनके आदर्शों को सीखने का संदेश दिया है। लंका चढ़ाई के समय श्रीराम ने विनयपूर्वक समुद्र से मार्ग देने की गुहार लगाई। समुद्र से आग्रह करते हुए श्रीराम को तीन दिन बीत गए। लेकिन समुद्र का उस पर कोई प्रभाव नहीं हुआ, तब भगवान राम समझ गए कि अब अपनी शक्ति से उसमें भय उत्पन्न करना अनिवार्य है। वहीं लक्ष्मण तो पहले से ही आग्रह के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि वे श्रीराम के बाण की अमोघ शक्ति से परिचित थे। वे चाहते थे कि उनका बाण समुद्र को सुखा देऔर सेना सुविधा से उस पार शत्रु के गढ़ लंका में पहुंच जाए।
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तुलसीदास - फोटो : सोशल मीडिया
इस घटना को श्री रामचरित मानस में तुलसी दास ने समुद्र को जड़ बताते हुए इस प्रकार लिखा है - 
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।
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रामायण का एक दृश्य - फोटो : सोशल मीडिया
प्रभु श्रीराम समुद्र के चरित्र को देखकर ये समझ गए कि अब आग्रह से काम नहीं चलेगा, बल्कि भय से काम होगा। तभी श्रीराम ने अपने महा-अग्निपुंज-शर का संधान किया, जिससे समुद्र के अन्दर ऐसी आग लग गई कि उसमें वास करने वाले जीव-जन्तु जलने लगे। तब समुद्र प्रभु श्रीराम के समक्ष प्रकट होकर हाथ में अनेक बहुमूल्य रत्नों का उपहार ले अपनी रक्षा के लिए याचना करने लगा और कहने लगा कि वह पंच महाभूतों में एक होने के कारण जड़ है। अतः श्रीराम ने शस्त्र उठाकर उसे उचित सीख दी। रामायण की कथा से हमें यह सीख मिलती है कि यदि आग्रह से जब काम न बने तो फिर भय से काम निकाला जाता है।
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