हिन्दू धर्म में वट के वृक्ष को बहुत महत्व दिया जाता है। वट का मतलब होता है बरगद। आध्यात्मिक दृष्टि से माना जाता है कि वट वृक्ष की पूजा करने वाली महिलाओं का सुहाग अजर-अमर रहता है धर्मग्रंथों के अनुसार, इसी दिन सावित्री अपने पति के प्राण यमराज से वापस ले आई थीं। यही वजह है कि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख समृद्धि के लिए इस व्रत को रखती हैं।
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वट वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप माना जाता है। यह इकलौता ऐसा वृक्ष है, जिसे तीनों देवों के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि इस वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। जिनके प्रसन्न होने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
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वट पूर्णिमा व्रत की विधि-
– सुबह उठते ही सबसे पहले स्नान करके साफ कपड़े और आभूषण पहनें।
– वट पूर्णिमा व्रत के दिन वट वृक्ष के नीचे अच्छी तरह साफ सफाई कर लें।
– वट वृक्ष के नीचे सत्यवान और सावित्री की मूर्तियां स्थापित करें और उन्हें लाल वस्त्र चढ़ाएं।
– बांस की टोकरी में 7 तरह के अनाज रखकर उसे कपड़े के दो टुकड़ों से ढक दें।
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वट पूर्णिमा व्रत की विधि-
– एक और बांस की टोकरी लें और उसमें धूप, दीप कुमकुम, अक्षत, मोली आदि रखें।
– इसके बाद बांस के बने पंखे से सत्यवान और सावित्री को हवा करते हुए वट वृक्ष के एक पत्ते को अपने बालों में लगाकर रखा जाता है।
– इसके बाद प्रार्थना करते हुए लाल मौली या सूत के धागे को लेकर वट वृक्ष की परिक्रमा करते हैं और घूमकर वट वृक्ष को मौली या सूत के धागे से 7 बार बांधते हैं।
– यह प्रक्रिया पूरी करने के बाद कथा सुनते हैं और पंडित जी को दक्षिणा देते हैं।
– पूजा के बाद घर के बड़ों के पैर छूकर आर्शीवाद लें। इसके बाद मिठाई खाकर अपना व्रत खोलें।