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Pradosh Vrat 2026: कब है अप्रैल माह का अंतिम प्रदोष व्रत? जानें सही तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि

Fri, 24 Apr 2026 05:04 PM IST
Shweta Singh ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

Pradosh Vrat: वैशाख माह के अंतिम प्रदोष व्रत को लेकर इस बार श्रद्धालुओं के मन में तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि यह व्रत 28 अप्रैल को रखा जाएगा या 29 अप्रैल को। सही तिथि के साथ-साथ पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि की जानकारी होना भी आवश्यक है, ताकि भगवान शिव की आराधना विधिपूर्वक की जा सके। 
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भौम प्रदोष व्रत - फोटो : amar ujala
Vaishakh Pradosh Vrat 2026: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। यह व्रत प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और प्रदोष काल में की गई पूजा को अत्यंत फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से शिव जी की पूजा करने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। वहीं वैशाख माह के अंतिम प्रदोष व्रत की तिथि को लेकर इस बार लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि यह व्रत 28 अप्रैल को रखा जाए या 29 अप्रैल को। ऐसे में सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि की जानकारी होना आवश्यक है, ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त किया जा सके।
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वैशाख माह का अंतिम प्रदोष कब? - फोटो : freepik
वैशाख माह का अंतिम प्रदोष कब? 
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि आरंभ:  28 अप्रैल, सायं 06:51 मिनट पर 
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि समाप्त: 29 अप्रैल, रात्रि 07:51 मिनट पर
ऐसे में प्रदोष व्रत 28 अप्रैल के दिन रखा जाएगा। मंगलवार के दिन पड़ने के कारण ये भौम प्रदोष व्रत रहेगा। 
 
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प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त - फोटो : adobe stock
अंतिम प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त
भौम प्रदोष व्रत के दिन यानी 28 अप्रैल, सायं  06:54 मिनट से 09:04 मिनट तक शिव जी के पूजन का शुभ मुहूर्त रहेगा। 

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प्रदोष व्रत पूजा विधि - फोटो : Adobe stock
प्रदोष व्रत पूजा विधि 
  • प्रदोष व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ व पवित्र वस्त्र धारण करें, इसके बाद पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखने का संकल्प लें।
  • पूजा के लिए पहले से ही आवश्यक सामग्री जैसे बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प, चावल (अक्षत), धूप, दीपक, गंगाजल और मिठाई आदि एकत्र कर लें, ताकि पूजा में कोई बाधा न आए।
  • प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के आसपास के समय को सबसे शुभ माना जाता है, इसलिए इस समय पुनः स्नान करें या कम से कम हाथ-पैर धोकर स्वयं को शुद्ध करें।
  • पूजा स्थान पर एक साफ चौकी स्थापित करें और उस पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर विधिपूर्वक रखें।
  • सबसे पहले शिवलिंग का गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करें, इससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
  • इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, पुष्प, भांग, धतूरा आदि अर्पित करें और पूरे मन से भगवान शिव का ध्यान करें।
  • पूजा के दौरान “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें और प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें, जिससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
  • अंत में भगवान शिव की आरती करें और नैवेद्य अर्पित करने के बाद प्रसाद को परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों में बांटकर व्रत का समापन करें। 
 
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प्रदोष व्रत आरती - फोटो : Adobe stock
प्रदोष व्रत आरती 
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे ।\
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी ।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा ।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा ।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला ।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ॥
जय शिव ओंकारा...॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी ।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥
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