भगवान विष्णु ने गीता में कहा है कि कर्मों के फल से मानव ही नहीं बल्कि पूरी प्रकृति और ईश्वर भी बंधे हैं और उन्हें भी अपने कर्मों के अनुसार सजा और उत्तम फल मिलता है। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है भगवान विष्णु का तुलसी से विवाह।
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एक पाप के कारण भगवान विष्णु को करना पड़ा था तुलसी से विवाह
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तुलसी पत्ता
पुराणों में कथा है कि भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का प्रयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि भगवान विष्णु ने तुलसी के साथ एक पाप पूर्ण काम किया था और इस पाप से मुक्ति के लिए उन्हें तुलसी से विवाह करके यह वरदान देना पड़ा था कि बिना तुलसी पत्ता के मेरी पूजा अधूरी मानी जाएगी। इसलिए भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का होना अनिवार्य है।
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एक पाप के कारण भगवान विष्णु को करना पड़ा था तुलसी से विवाह
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भगवान विष्णु
भगवान विष्णु को अपने वरदान के कारण जिस दिन तुलसी से विवाह करना पड़ा था वह कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथी मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने शयन के बाद जगते हैं और तुलसी के साथ इनका विवाह संपन्न होता है। इस वर्ष यह तिथि 10 नवंबर को है।
एक पाप के कारण भगवान विष्णु को करना पड़ा था तुलसी से विवाह
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शिव पूजा में तुलसी
- फोटो : tulsi shiv puja
भगवान विष्णु को जिस पाप के कारण तुलसी से विवाह करना पड़ा था उसका संबंध जलंधर नामक असुर से है। जलंधर भगवान शिव का अंश था जो सागर से उत्पन्न हुआ था इसलिए देवी लक्ष्मी का भाई माना जाता है। जलंधर का विवाह वृंदा नाम की कन्या से हुआ था जो भगवान विष्णु की परम भक्त थी।
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शिव पार्वती
वृंदा की भक्ति और सतीत्व के बल पर जलंधर अजेय हो गया था और देवताओं को पीड़ित करने लगा था। जलंधर ने देवी पार्वती पर जब कुदृष्टि डाली तब त्रिदेवों ने जलंधर के वध की योजना बनाई। इस योजना के तहत भगवान शिव ने जलंधर से युद्ध किया और भगवान विष्णु ने वृंदा का सतीत्व भंग।
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नारद विष्णु भगवान
वृंदा का सतीत्व भंग होते ही जलंधर कमजोर पड़ गया और भगवान शिव ने उसका वध कर दिया। पति की मृत्यु और भगवान विष्णु के छल से सतीत्व भंग करने की बात जब वृंदा ने जाना तो उन्होंने भगवान विष्णु को पत्थर का हो जाने का शाप दे दिया।
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तुलसी
ऐसे में सृष्टि की रक्षा के लिए सभी देवी देवताओं ने वृंदा से भगवान विष्णु को क्षमा करने की विनती की। वृंदा ने भगवान विष्णु को क्षमा कर दिया लेकिन खुद तुलसी का पौधा बन गई। इसके बाद भगवान विष्णु ने तुलसी को वरदान दिया कि तुलसी के मान-सम्मान में कोई कमी नहीं आए इसलिए शलिग्राम रूप में तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के साथ होगा और भगवान विष्णु और उनके जितने भी अवतार हैं उन सभी की पूजा में तुलसी का प्रयोग अनिवार्य होगा। तुलसी भगवान विष्णु के सिर पर रहेगी और प्रसाद में तुलसी नहीं होने पर भगवान उसे ग्रहण नहीं करेंगे।