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Surya Grahan Katha: आखिर क्यों लगता है सूर्य ग्रहण ? यहां पढ़ें इससे जुड़ी रोचक और पौराणिक कथाएं

Sat, 29 Mar 2025 07:01 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Surya Grahan se Judi Pauranik Kathaein: साल 2025 का पहला सूर्य ग्रहण 29 मार्च को लगेगा, जो आंशिक होगा। भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं बल्कि इसे हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से भी देखा जाता है। आइए जानते हैं कि सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में। 
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Surya grahan katha - फोटो : adobe stock
Surya Grahan Kyon Lagta Hai: सूर्य ग्रहण हमेशा से ही एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना मानी जाती रही है, जो विज्ञान, ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ी हुई है। यह घटना तब होती है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आकर सूर्य की रोशनी को कुछ समय के लिए ढक लेता है। साल 2025 का पहला सूर्य ग्रहण 29 मार्च को लगेगा, जो आंशिक होगा। इस वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण पहले ही 14 मार्च को होली के दिन लग चुका है, जिससे इस साल के ग्रहणों को लेकर विशेष चर्चा हो रही है।

भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं बल्कि इसे हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से भी देखा जाता है। भारतीय शास्त्रों और पुराणों में इससे जुड़ी कई कहानियां और रहस्य छिपे हुए हैं। आइए इसी क्रम में जानते हैं सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक और रोचक कथाओं के बारे में। 
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Surya grahan katha - फोटो : adobe stock
राहु- केतु और अमृत मंथन की कथा
सूर्य ग्रहण से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन की है। इसका उल्लेख विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलता है। इस कथा के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया, तो भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों में संघर्ष शुरू हो गया। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत वितरण का कार्य किया, लेकिन उन्होंने एक चाल चली और असुरों को अमृत देने से मना कर दिया।

लेकिन असुरों में से एक असुर जिसे स्वरभानु कहा जाता था, वह देवताओं का वेश धरकर अमृत ग्रहण करने में सफल हो गया।  सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान कर ली और भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दे दी। भगवान विष्णु ने क्रोधित होकर अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

चूंकि उसने अमृत पान कर लिया था, इसलिए उसका शरीर अमर हो गया। उसका सिर राहु और धड़ केतु के रूप में अस्तित्व में आया। तभी से राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा से शत्रुता रखते हैं और समय-समय पर बदला लेने के लिए इन्हें ग्रास लेते हैं। मान्यताओं की माने तो इसी वजह से सूर्य और चंद्र ग्रहण होता है। 
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Surya grahan katha - फोटो : adobe stock
रामायण में भी मिलता है सूर्य ग्रहण का उल्लेख 
रामायण में भी सूर्य ग्रहण का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार जब भगवान राम और रावण के बीच युद्ध हो रहा था, तब रावण की शक्तियां  चरम पर थीं। मान्यता है कि युद्ध के दौरान एक भयानक सूर्य ग्रहण हुआ था, जिससे चारों ओर अंधेरा छा गया।
ऐसा कहा जाता है कि इसी ग्रहण के समय भगवान राम ने भगवान सूर्य से विशेष शक्ति प्राप्त की और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ किया और इसी से उन्हें रावण को परास्त करने की शक्ति मिली। इस घटना को रामायण में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है।
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Surya grahan katha - फोटो : adobe stock
महाभारत में भी सूर्य ग्रहण ने बदली युद्ध की दिशा 
महाभारत में सूर्य ग्रहण को रणक्षेत्र में एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया गया था। जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध हो रहा था, तब अर्जुन ने जयद्रथ का वध करने की प्रतिज्ञा की थी। लेकिन कौरवों ने जयद्रथ की सुरक्षा के लिए एक मजबूत रणनीति बनाई थी। भगवान कृष्ण को यह ज्ञात था कि अर्जुन केवल सूर्यास्त से पहले ही जयद्रथ का वध कर सकते हैं। ऐसे में, उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से एक कृत्रिम सूर्य ग्रहण उत्पन्न कर दिया, जिससे चारों ओर अंधेरा छा गया और कौरवों ने सोचा कि सूर्यास्त हो गया है। जैसे ही जयद्रथ ने अपनी सुरक्षा ढीली की, भगवान कृष्ण ने सूर्य को फिर से प्रकट कर दिया और अर्जुन ने अवसर का लाभ उठाकर जयद्रथ का वध कर दिया। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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