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Surya Dev Ke Upay: सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए रविवार को करें ये उपाय, हर इच्छा होगी पूरी

Sat, 18 Jan 2025 02:49 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Surya Upay: हिंदू मान्यताओं के अनुसार सप्ताह में हर दिन किसी न किसी देवी देवता व ग्रह से जुड़ा होता है, इसके आधार पर पूजा-पाठ करने से जातक के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। 
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Surya Dev Ke Upay - फोटो : अमर उजाला
Surya Upay: हिंदू मान्यताओं के अनुसार सप्ताह में हर दिन किसी न किसी देवी देवता व ग्रह से जुड़ा होता है, इसके आधार पर पूजा-पाठ करने से जातक के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। ज्योतिष की मानें तो जैसे शनिवार शनिदेव और शनि ग्रह से जुड़ा है, ठीक वैस ही रविवार सूर्य देवता और सूर्य ग्रह से संबंधित है। इस दिन सूर्य उपासना करने से जातक के आत्मविश्वास में वृद्धि और नौकरी में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है, यही नहीं कुंड़ली में इनकी स्थिति मजबूत होने पर व्यक्ति को करियर में ऊंचा पद मिलता है। परंतु स्थिति कमजोर होने पर कई मानसिक अशांति झेलनी पड़ती है। ऐसे में रविवार के दिन  इन खास उपायों को करने से सूर्यदेव को प्रसन्न और कई समस्याओं से निजात पाया जा सकता है, आइए इनके बारे में जानते हैं।
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Surya Dev Ke Upay - फोटो : अमर उजाला
सूर्यदेव को प्रसन्न करने के उपाय
  • ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार रविवार को सूर्य नमस्कार करने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं, जिससे अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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Surya Dev Ke Upay - फोटो : Adobe stock
  • धार्मिक मान्यताओं की मानें तो कुंड़ली में सूर्य कमजोर होने पर जातक को रविवार के दिन गुड़, दूध, चावल और कपड़े का दान करना चाहिए। इस उपाय को करने से जातक के भाग्य में वृद्धि हो सकती हैं।
  • ज्योतिषियों के मुताबकि सूर्यदेव को लाल रंग अति प्रिय है। ऐसे में रविवार को लाल रंग के वस्त्र धारण करके उनकी पूजा करें, इससे जीवन में खुशियों का वास होता है। 

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Surya Dev Ke Upay - फोटो : freepik
  • मान्यता है कि रविवार को घर के मुख्य द्वार पर घी का दीप जलाकर रखने से धन की देवी मां लक्ष्मी और सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। 
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Surya Dev Ke Upay - फोटो : freepik
रविवार के दिन सूर्य देव के इन 12 मंत्रों का जाप करने से रूके हुए कार्यों को गति प्राप्त होती हैं
  • ॐ आदित्याय नमः।
  • ॐ सूर्याय नमः।
  • ॐ रवेय नमः।
  • ॐ पूषणे नमः।
  • ॐ दिनेशाय नमः।
  • ॐ सावित्रे नमः।
  • ॐ प्रभाकराय नमः।
  • ॐ मित्राय नमः।
  • ॐ उषाकराय नमः।
  • ॐ भानवे नमः।
  • ॐ दिनमणाय नमः।
  • ॐ मार्तंडाय नमः।
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Surya Dev Ke Upay - फोटो : adobe stock
  • ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार रविवार को सूर्य चालीसा का पाठ करने से कुंडली में सूर्य ग्रह की स्थिति मजबूत होती है, साथ ही जातक के कष्टों का निवारण भी होता है-

श्री सूर्य चालीसा
 

 

  • दोहा

कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।

चौपाई

जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
 

विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अंबरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
 

सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
 

मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।
 

मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,
आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।
 

चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
 

सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।
 

उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।
 

अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।


भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।


कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।


युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।


जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।


सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।


दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।


ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मंद सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।


धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।


परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।


भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।


अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।

 

दोहा

भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख संपत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

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