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Budhwar Ke Upay: सफलता के लिए अवश्य करें बुधवार के ये 5 सरल उपाय, गणेश जी की मिलेगी विशेष कृपा

Tue, 20 Jan 2026 05:57 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Budhwar Ke Upay: हिंदू धर्म में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित माना गया है। इस दिन विधि-विधान से गणपति बप्पा की पूजा और कुछ सरल उपाय करना बेहद शुभ होता है। इससे सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
 
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Budhwar Ke Upay - फोटो : अमर उजाला
Budhwar Ke Upay: बुधवार गणेश जी को समर्पित दिन है, जिसपर पूजा-पाठ करने से प्रभु शीघ्र ही प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं। इसके प्रभाव से साधक के जीवन से विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और रुके हुए कार्यों में भी गति आती हैं। शास्त्रों के मुताबिक, बुधवार छात्रों के लिए और भी खास होता है, क्योंकि इस दिन कुछ सरल उपाय करने से न केवल समस्याओं का अंत होता है बल्कि साधक के सफलता के नए मार्ग भी खुलते हैं। यही नहीं इन उपायों के प्रभाव से व्यक्ति की निर्णय क्षमता मजबूत, मानसिक तनाव कम व नौकरी-करियर से जुड़ी परेशानियां दूर होने लगती हैं। ऐसे में आइए बुधवार के इन उपायों को जानते हैं।
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Budhwar Ke Upay - फोटो : freepik
  • ज्योतिषियों की मानें, तो बुधवार को गाय को हरी घास या हरा चारा खिलाने से कुंडली में बुध की स्थिति मजबूत होती है। इससे पापों से मुक्ति और जीवन में सुख-समृद्धि वास करती हैं। यह सरल उपाय मन की शांति और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखता है। साथ ही अटके कार्यों को भी गति मिलती हैं।
  • बुधवार के दिन गणेश जी को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं। इस दौरान आप ॐ गण गणपतये नमः मंत्र का 108 बार जाप करें। मान्यता है कि, इससे प्रभु प्रसन्न होते हैं। साथ ही विवाह, करियर, नौकरी आदि में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
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Budhwar Ke Upay - फोटो : freepik
  • आप बुधवार को हरी मूंग की दाल का दान भी कर सकते हैं। यह उपाय कुंडली में बुध ग्रह के स्थान की स्थिति को मजबूत करता है। साथ ही करियर मार्ग में आ रही बाधाएं भी दूर होती हैं।

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Budhwar Ke Upay - फोटो : freepik
  • धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, बुधवार के दिन हरे रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। साथ ही जरूरतमंद व्यक्ति को हरे फल जैसे अमरूद, अंगूर या कोई हरी सब्जी दान करने का भी विशेष महत्व होता है। इसके प्रभाव से आर्थिक परेशानियां कम होती हैं।
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Budhwar Ke Upay - फोटो : freepik
  • आप इस दिन गणेश जी की चालीसा का भी पाठ करें। यह बेहद शुभ होता है। इससे शुभ-मांगलिक कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। इसके बाद आप प्रभु को 11 दुर्वा भी चढ़ा दें।
श्री गणेश जी की चालीसा

दोहा
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्व-विख्याता॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्घारे॥
कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण, यहि काला॥
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्धान रुप है।
पलना पर बालक स्वरुप है॥
बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥
कहन लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहाऊ॥
पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा।
बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी।
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटि चक्र सो गज शिर लाये॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वन दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥
श्री गणेश यह चालीसा।
पाठ करै कर ध्यान॥
नित नव मंगल गृह बसै।
लहे जगत सन्मान॥

दोहा
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
 यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

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