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Shani Dev: इस चालीसा से शीघ्र प्रसन्न होते हैं शनि देव, जानें इसके नियम और लाभ

Thu, 23 Apr 2026 05:14 PM IST
Megha Kumari धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Shani Dev: शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए जहां काली चीजों का दान का महत्व है, वहीं इस शक्तिशाली चालीसा के पाठ से भी प्रभु जल्दी प्रसन्न होते हैं। आइए इसके बारे में जानते हैं।
 
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Shani Dev - फोटो : अमर उजाला AI
Shani Dev: हिंदू धर्म में शनिदेव की उपासना को विशेष स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि, उनकी पूजा के प्रभाव से जीवन की कठिनाइयां कम होने लगती हैं। ज्योतिष शास्त्रों  में शनि को न्याय के देवता कहा गया है, क्योंकि वह व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। ऐसे में यदि उनकी विधि-विधान से पूजा की जाए, तो व्यक्ति को अच्छे परिणामों की प्राप्ति होती हैं। पूजा में विशेष रूप से शनि चालीसा का पाठ करने से जीवन में चल रही बाधाएं धीरे-धीरे कम होने लगती हैं और संघर्षों का सकारात्मक परिणाम मिलने लगता है। धार्मिक ग्रंथों की मानें, तो शनि चालीसा का नियमित पाठ करने से न केवल शनि दोष शांत होता है, बल्कि व्यक्ति का मानसिक तनाव भी कम होता है। ऐसे में आइए इसके नियम को जानते हैं।
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Shani Dev - फोटो : अमर उजाला
शनि चालीसा पाठ के नियम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनि चालीसा का पाठ हमेशा शांत मन और श्रद्धा के साथ करना चाहिए। पूजा के समय ध्यान पूरी तरह भगवान शनि पर केंद्रित रखें। इसके अलावा पाठ करते समय साफ और स्वच्छ स्थान का चयन करें। एक साफ आसन बिछाकर ही बैठें। इससे सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
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Shani Dev - फोटो : freepik
  • शनिवार के दिन शनि चालीसा का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन किया गया पाठ जल्दी प्रभाव दिखाता है और साढ़ेसाती-ढैय्या का असर भी कम होता है।

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Shani Dev - फोटो : अमर उजाला
  • आप इसे सुबह या शाम, किसी भी समय कर सकते हैं, लेकिन समय का नियमित होना ज्यादा लाभकारी माना जाता है। पाठ से पहले और बाद में शनि देव का ध्यान करें और अपने कर्मों के लिए क्षमा याचना करें।
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Shani Dev - फोटो : अमर उजाला
शनि चालीसा

दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

चौपाई
जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥

रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥
शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

दोहा
पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

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