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सर्वपितृ अमावस्या कब है? जानें पितृ पक्ष की अंतिम तिथि, श्राद्ध विधि और कुतुप-रौहिण मुहूर्त

Mon, 05 Oct 2026 02:54 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Sarvapitru Amavasya 2026: पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है। इस दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और अन्नदान करने की परंपरा है। जानें 2026 में सर्वपितृ अमावस्या की तिथि, श्राद्ध विधि और कुतुप-रौहिण मुहूर्त।
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सर्वपितृ अमावस्या 2026 - फोटो : AI

Sarva Pitru Amavasya 2026: पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है। हिंदू धर्म में इस अमावस्या को पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। खासतौर पर ऐसे पूर्वज, जिनकी मृत्यु की तिथि परिवार को ज्ञात नहीं है, उनके लिए इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। इसी वजह से इसे अमावस्या श्राद्ध, महालय अमावस्या और पितृ विसर्जन अमावस्या भी कहा जाता है। साल 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्तूबर, शनिवार को पड़ रही है। इस दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण के लिए दिन के विशेष मुहूर्त बताए गए हैं। आइए जानते हैं सर्वपितृ अमावस्या की तिथि, श्राद्ध के शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व, कथा और पूजा विधि।

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सर्वपितृ अमावस्या तिथि 9 अक्तूबर की रात 9:35 बजे शुरू होगी और 10 अक्तूबर की रात 9:19 बजे समाप्त होगी। - फोटो : freepik

सर्वपितृ अमावस्या 2026 कब है?
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में अमावस्या तिथि 9 अक्तूबर की रात 9:35 बजे शुरू होगी और 10 अक्तूबर की रात 9:19 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या का पर्व 10 अक्तूबर 2026 को मनाया जाएगा। यह पितृ पक्ष की अंतिम तिथि होती है। इस दिन उन सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका किसी कारण से नियमित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया।

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श्राद्ध के शुभ मुहूर्त - फोटो : Amar Ujala

सर्वपितृ अमावस्या 2026 श्राद्ध के शुभ मुहूर्त 
सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध कर्म के लिए दिन का अपराह्न काल विशेष माना जाता है। 10 अक्तूबर 2026 को प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं—

  • कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
  • रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 बजे से 1:18 बजे तक
  • अपराह्न काल: दोपहर 1:18 बजे से 3:37 बजे तक
  • कुतुप और रौहिण मुहूर्त की अवधि करीब 47-47 मिनट है, जबकि अपराह्न काल लगभग 2 घंटे 20 मिनट का रहेगा।

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सर्वपितृ अमावस्या क्यों है खास? - फोटो : Amar Ujala

सर्वपितृ अमावस्या क्यों है खास?
पितृ पक्ष में सामान्यतः जिस पूर्वज की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। लेकिन हर परिवार के पास अपने सभी पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी हो, ऐसा जरूरी नहीं है। ऐसे में सर्वपितृ अमावस्या महत्वपूर्ण हो जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन ज्ञात और अज्ञात सभी पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। जिन पूर्वजों की श्राद्ध तिथि भूल गई हो, उनके निमित्त भी इस दिन कर्म करने की परंपरा है। इसी कारण सर्वपितृ अमावस्या को पितृ पक्ष का एक विशेष और व्यापक श्राद्ध दिवस माना जाता है।

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महालय अमावस्या और पितृ विसर्जन अमावस्या क्यों कहते हैं?

महालय अमावस्या और पितृ विसर्जन अमावस्या क्यों कहते हैं?
सर्वपितृ अमावस्या के कई नाम प्रचलित हैं। इसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक परंपराओं में यह पितृ पक्ष के समापन का दिन है। वहीं, पितृ विसर्जनी अमावस्या नाम इस मान्यता से जुड़ा है कि पितृ पक्ष के दौरान पितरों का स्मरण, तर्पण और श्राद्ध करने के बाद अमावस्या के दिन उन्हें विदाई दी जाती है। इसलिए यह दिन केवल श्राद्ध का ही नहीं, बल्कि श्रद्धापूर्वक पितरों को विदा करने का भी प्रतीक माना जाता है।

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सर्वपितृ अमावस्या का धार्मिक महत्व - फोटो : अमर उजाला

सर्वपितृ अमावस्या का धार्मिक महत्व
सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ किए गए इन कर्मों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

  • ज्ञात-अज्ञात पितरों का स्मरण: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है।
  • छूटे हुए श्राद्ध का अवसर: मान्यता है कि यदि पितृ पक्ष में किसी पूर्वज का श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त कर्म किया जा सकता है।
  • पितरों की विदाई: पितृ पक्ष की समाप्ति पर पितरों को श्रद्धापूर्वक विदा करने की परंपरा है।
  • दान और अन्न का महत्व: इस दिन जरूरतमंदों को भोजन कराने और अपनी क्षमता के अनुसार दान करने को पुण्यकारी माना जाता है।
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सर्वपितृ अमावस्या की पूजा और श्राद्ध विधि - फोटो : freepik
सर्वपितृ अमावस्या की पूजा और श्राद्ध विधि
  • सुबह स्नान करने के बाद साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए श्राद्ध कर्म का संकल्प लिया जाता है।
  • धार्मिक परंपरा के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित किया जाता है।
  • तर्पण में जल के साथ काले तिल का प्रयोग भी किया जाता है।
  • अपने कुल और परिवार की परंपरा के अनुसार तर्पण की विधि अपनाना उचित माना जाता है।
  • श्राद्ध के लिए सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। कई परिवारों में पितरों को प्रिय माने जाने वाले पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। भोजन का एक अंश पितरों के निमित्त अर्पित करने की परंपरा है।
  • कई हिंदू परंपराओं में श्राद्ध के दौरान पंचबलि का विधान बताया गया है। इसमें गाय, कुत्ते, कौए, चींटियों और देवताओं के निमित्त भोजन अर्पित किया जाता है। 
  • श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मण भोजन कराने और दक्षिणा देने की परंपरा है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री का दान भी किया जा सकता है।
  • कई परिवारों में सर्वपितृ अमावस्या की शाम घर के बाहर या दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाने की परंपरा है। इसे पितरों के प्रति श्रद्धा और विदाई के भाव से जोड़ा जाता है।

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सर्वपितृ अमावस्या पर क्या नहीं करना चाहिए? - फोटो : Amar Ujala

सर्वपितृ अमावस्या पर क्या नहीं करना चाहिए?

  • इस दिन जानबूझकर किसी जरूरतमंद को भोजन या सहायता से वंचित न करें।
  • घर में अनावश्यक विवाद और कलह से बचें।
  • श्राद्ध कर्म को दिखावे का माध्यम न बनाएं।
  • भोजन की बर्बादी न करें।
  • अपनी पारिवारिक या धार्मिक परंपरा से अलग कोई कर्म केवल दूसरों की देखा-देखी में न करें।
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सर्वपितृ अमावस्या की कथा - फोटो : freepik

सर्वपितृ अमावस्या की कथा
सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी लोक-मान्यताओं में एक कथा ऐसी भी मिलती है, जिसमें पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध के महत्व को बताया गया है। कहा जाता है कि एक ब्राह्मण अपने पितरों के प्रति बेहद श्रद्धावान था, लेकिन उसे अपने पिता और अन्य पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथियां मालूम नहीं थीं। इसी कारण वह इस बात को लेकर चिंतित रहता था कि वह उनके लिए श्राद्ध किस दिन करे। पितृ पक्ष के दौरान उसे अपने पूर्वजों का स्मरण हुआ। तब उसे यह समझ आया कि पितरों के प्रति श्रद्धा केवल एक निश्चित तिथि तक सीमित नहीं है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनके लिए अमावस्या के दिन श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। इसके बाद उसने सर्वपितृ अमावस्या पर विधि-विधान से पितरों का तर्पण किया, भोजन कराया और दान-पुण्य किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार उसके इस श्रद्धापूर्ण कर्म से पितर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया। इस कथा का मूल संदेश यही है कि पितरों का स्मरण केवल तिथि याद रखने तक सीमित नहीं, बल्कि श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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