सर्वपितृ अमावस्या की कथा
- फोटो : freepik
सर्वपितृ अमावस्या की कथा
सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी लोक-मान्यताओं में एक कथा ऐसी भी मिलती है, जिसमें पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध के महत्व को बताया गया है। कहा जाता है कि एक ब्राह्मण अपने पितरों के प्रति बेहद श्रद्धावान था, लेकिन उसे अपने पिता और अन्य पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथियां मालूम नहीं थीं। इसी कारण वह इस बात को लेकर चिंतित रहता था कि वह उनके लिए श्राद्ध किस दिन करे। पितृ पक्ष के दौरान उसे अपने पूर्वजों का स्मरण हुआ। तब उसे यह समझ आया कि पितरों के प्रति श्रद्धा केवल एक निश्चित तिथि तक सीमित नहीं है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनके लिए अमावस्या के दिन श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। इसके बाद उसने सर्वपितृ अमावस्या पर विधि-विधान से पितरों का तर्पण किया, भोजन कराया और दान-पुण्य किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार उसके इस श्रद्धापूर्ण कर्म से पितर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया। इस कथा का मूल संदेश यही है कि पितरों का स्मरण केवल तिथि याद रखने तक सीमित नहीं, बल्कि श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।